उन्वान

 दोस्तों की खातिर,अपनी सारी उन्वान देने वालें बच्चें।

अब कहां मिलते हैं,मोहब्बत में जान देने वाले बच्चें।


अब नहीं रही वो मासूमियत,न रहा वो अब सादगीपना;

जब होते थे,कागज के परिंदों को भी"उड़ान देने वाले बच्चें।


इतना तो समझिए,कोई उम्रभर इंतजार में रह सकता हैं;

मोहब्बत में झूठी कसमें,झूठी जुबान देने वालें बच्चें।


इक ही उम्र सौ लोगों से हज़ार रिश्ते बनाने वालें बच्चें;

क्या समझेंगे,चाह में कैसे होते थे कुर्बान होने वालें बच्चें।


परेशानियों से गुजारिए,जो घर के लाडले हैं,अज़ीज़ हैं;

मुर्गियों सी परवरिश से न होंगे,बाज़ की उड़ान वाले बच्चें।

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