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ठगा गया हूं

 नैन भींगे आँसुओं के,कतार से ठगा गया हुँ। मत मिलों मुझें प्यार से,प्यार से ठगा गया हुँ। भाव से प्रभाव से,तो'कभी कवि स्वभाव से कभी किसी लगाव से,ऐतबार से ठगा गया हुँ। नयन भरें ख़्वाब से,तो'कभी किसी गुलाब से, भाई के स्नेह से,कभी घर-बार से ठगा गया हुँ। फूल तो कबूल हैं,मग़र'बस की यहीं मैंने भूल हैं; फूल की तलाश में,मैं यहाँ ख़ार से ठगा गया हुँ।

गुमसुम

 कलेजा मुंह तलक आ जाएगा,जो गुमसुम नज़र आओगी। मेरी शायरियाें को गौर से पढ़ना, इसमें तुम नजर आओगी। यूं तो कयामत लगती हो तुम,सर से लेकर पांव तक;मगर" आंखों में गर काजल लगा लों,तो"बहुत मासूम नज़र आओगी। कोई बयां करें तुम्हें शब्दों में,यकीनन ग़ज़ल बन जाओगी; बेसुरा भी जो तुम्हें गुनगुनाना बैठें,तो"तरन्नुम नज़र आओगी। माथें पे बिंदी,कानों में झुमका,जो मांग में सिंदूर हो मेरा; जमाना रश्क करेगा,देखकर"जो तेरी तबस्सूम नजर आओगी।

खफा

 इत्ती बात पर भी,बता"कोई क्यूं खफा होगा। मुझे भरोसा हैं,तू ही मेरे जख्म का दवा होगा। कोई रूह तक पहुंचें,मोहब्बत ऐसी होनी चाहिए; वर्ना यूं दिल लगानें से अच्छा,होना जुदा होगा। जो तेरे मनमाफिक हो,तुम वही रिश्ता बचाना; मुझे मंजूर होगा, यहां जो भी तेरा फैसला होगा। और मैं कोई उम्मीद लिए,अब जीता ही नहीं हुं; तू गर न हुआ मेरा,तो फिर"ना ही मेरा खुदा होगा।

बाजार

 चंद खोटें सिक्के क्या जो बाज़ार में आ गए हैं। सुना हैं की वो भी,अब इश्तहार में आ गए हैं। और वो अपनी कीमत, हमें कुछ ऐसे बताता हैं;, लगता हैं दो कौड़ी के लोग,व्यापार में आ गए हैं। इक कंचन सी काया,जुल्फें भी संवारी गई थी; हमनें तारीफ़ की,तो"कहा की प्यार में आ गए हैं। इक उम्र तक जिन्होंने,हिराकत से देखा हैं हमें; हैसियत क्या बदलीं,वो भी सरोकार में आ गए हैं। जितनेंं लुच्चें थे,अब बाजार में दिखतें ही नहीं; जो चुनाव आया था,सभी सरकार में आ गए हैं। कल तक दिलों जां थे जो,अब नज़र मिलातें नहीं, साहेब बन गए हैं,जबसे वो कार में आ गए हैं।

चराग

 जो चराग जलने थे, यकीनन जल गए होंगे। हम अबतक,तो"उनके दिल से निकल गए होंगे। हमको बदलना होता,तो फिर"लौटकर नहीं आता; मगर जिन्हें परहेज था बदलने से,बदल गए होंगे। ये तो मालूम था,तुम फिर कहां मिलोगें उसी जगह; एग्जाम निकल गया,तो"क्लास से भी निकल गए होंगे। खुशबू जब तलक रहीं होगी,खूब सीने से लगाया होगा; बोझिल होते यकीनन तुम"फूल को भी मसल गए होंगे।

खिरकियाँ

 दरवाजें के नसीब में कहां,खिरकियां होती हैं। दिल में दिमाग वाली,अक्सर लड़कियां होती हैं। वक्त के साथ यहां,क्या_क्या नहीं बदलें हैं ; अब तो झूठी मोहब्बत,झूठी हिचकियां होती हैं। और नए उम्र के बच्चों की,क्या शिकायत करें हम; अब इस दौड़ के बुजुर्गों में भी,बहुत खामियाँ होती हैं। माना महफूज़ रखनें के लायक,मेरा दिल नहीं हैं; मगर नज़र से वो भी उतरती हैं,जो रोशनियां होती हैं।

शान

 तमाम उम्र नुकसान में रहें। रुतबा नहीं घटा,शान में रहें। पैरवियों की उन्हें ही जरूरत हैं; जो पढ़े लिखे,रौशनदान में रहें। जो हीरा है हीरा ही बनता हैं; चाहें वो कोयलें की खान में रहें। भले लाख जख्म दो,कोई बात नहीं; कभी तेरे अपने थे हम,ध्यान में रहें। वो आँखिर में,गिर गए,खत्म हो गए;   ताउम्र जो यहां आसमान में रहें।

नाज

 यूं तो खाली हैं हम,अब दिल को लगानें के लिए। मगर कौन आएगा नाज़,समंदर का उठाने के लिए। और हमको किसी के सांचे में नहीं,अब ढलना हैं; इश्क हैं तो स्वीकारों,जैसे भी हो ज़माने के लिए। गर बगावत करने पे आए,तो"इतिहास बदल देंगे; तुम हमें न उकसाओ,पत्थर को उठाने के लिए। और किसी के शक्शीयत पर,सवाल ऐसे न उठाओ; इक लम्हा भी काफ़ी हैं,दुनियां पे छा जाने के लिए। माना लकीर खींचकर,रिश्ते तो नहीं बनाए जातें; तुम कहो,तो"हद से गुज़र जायेंगे,तुम्हें पाने के लिए।