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लोग

 तेरे सफर में तुम्हे मिले है खूब शयाने लोग। तुम्हे देखने को,लगे है यहां आने जाने लोग। हमारा वास्ता सनम,हो तो"यहां इस तरह हो; हमारा चश्मा ढूंढे,अक्सर तेरे सिरहाने लोग। सच की यहां हालत ये हैं की,क्या बताए साहेब; बयां करते ही लगते हैं अब घर जलाने लोग। उन्हें बचाकर रखिए,जो खानदानी हकीकत हैं; तुम्हारी असलियत है,जो घर में है पुराने लोग। अगर हो दिल खेलना,तो"कोई बात नहीं हैं; होगा जब इश्क तो लगेंगे,आंखे दिखाने लोग। मैं मजबूर हु,अब वो बड़ी लाचार सी रहती हैं; अब दिल को लगे है,यहां दुनियादारी बताने लोग।

तितलियां

 कुछ तो समझा करो सनम,मेरे दिल को बेतार होकर,तो"घर में बिजलिया नही आती। जबसे देखा है उस माली के हाथ में खंजर; अब उस बाग में,साहेब"तितलियां नहीं आती। सिर्फ हलचल देखकर,न फेंका करो जाल; सांप भी होते हैं,सिर्फ मछलियां नहीं आती। इरादा इश्क का हो तो,यूं रूठा न करो सनम; आम के पेड़ के पर,साहेब"इमलियाँ नहीं आती। इंसानियत इस कदर,अब मर चुकी हैं यहां अमीर खिरकियों से,इक भी गुठलिया नहीं आती।

मर्द

 हमारी रोशनी खा गई,समय की गर्द साहेब। वर्ना हम भी होते थे कभी,मिशालें मर्द साहेब। यहां पर गजलों का,मत पूछिए हाल क्या हैं; काफिया मालूम नहीं,बनते हैं बसीर बद्र साहेब। माली को फूल से,फूल को भौरों से शिकायत हैं; ऐसे हालात में अपनों का,कौन बांटेगा दर्द साहेब। उम्रभर के तजुर्बे को,बच्चों ने ख़ाक बताया हैं; इस तरह बुढ़ापा घरों में,हो रहा है फर्द साहेब।