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समतल

 शबनम की चोट से,घायल लगती हैं। वो लड़की इश्क़ में,पागल लगती हैं। जवानी अक्सर,उसी मोड़ पर"फिसलती हैं; जहां की राह बिल्कुल,समतल लगती हैं। पपिहा,मोर,कोयल के सुर से भी मधुर; यहां बजती हुई उसकी,पायल लगती हैं। ऐसे रहती वो पास,अब नहीं हैं मेरे;मगर" अहसासें_दिल वो,अक्सर पल पल लगती हैं।

अंगीठी

 तुम्हें अपने दर्द का तो पता है प्रियें; तुम क्या जानों,मुझपे"क्या बीती हैं। उम्रभर आग से,लगता"डर था हमें; आज पूरा जीवन हुआ,मेरा अंगीठी हैं। मैं सीधा सादा बेचारा,इतना समझा नहीं; अब मोहब्बत में चलती,राजनीति हैं। सुनी आंखो को,हज़ार ख्वाब दिखाकर; ख्वाब तोड़ते हो,कहते हो"कूटनीति हैं। हमनें सुना था प्यार,राधा कृष्ण जैसा; रोज जो बदल जाए,वो कैसी प्रीति हैं।

कलक्टरी

 तुम्हारी कलक्तरी तुमको,मुबारक हो साहिबा; हमें तो तुम्हें दिल की,सनम"रानी बनाना था। ओहदा तो उम्र रहते ही,खत्म हो जाना हैं; हमें मोहब्बत की खूबसूरत,कहानी बनाना था। इक सदी तक याद रखें जाए,यहां हमदोनों; कोई किस्सा ऐसा सनम,मुंहजबानी बनाना था। मिलकर शराब में,शराब का ही हो जाता हैं। सनम हमें इक दूजे से ऐसा,पानी बनाना था।

अजान

 माना खुदा ने ही यहां,बनाया होगा तुमको; मगर अब खुदा भी तेरी,अज़ान ले सकता हैं। और तुझे कटार की,भला जरूरत क्या हैं; तू मुस्करा कर भी,किसी की जान ले सकता हैं। 8 सालों की मोहब्बत पे,तुझे यकीन न रहा;तो" दिल में खंजर घुसाकर भी,इम्तिहान ले सकता हैं। आज उसने मांगी हैं मुझसें,चंद लम्हें कुछ पल; जो चाहता,तो"मेरी सारी, उनवान ले सकता हैं। जिसने खोया हैं तुम्हें,उसे खोने का डर क्या होगा; इससे ज्यादा भी भला क्या,भगवान ले सकता हैं। जो देख_रेख में रहें खूब,उनकी भी इज्जत चली गई ; तुम्हें मालूम ही नहीं कितना,निगेहबान ले सकता हैं।

नयन

 नाशाद होकर भी,मेरे नयन देखतें हैं। हम आज भी तुम्हारें,सपन देखतें हैं। इस मलाल में,अब जिंदगी गुजरती हैं; के अब दूसरे भी तुझको,नग्न देखतें हैं। और कितना खोया हूं,मैं तुम्हें खोकर; देखनेवालें भी मेरा,यहां जतन देखतें हैं। नए लोगों की पहचान तुमको कहां हैं; लोग इश्क़ में सिर्फ,अब"बदन देखतें हैं। उन्हें दौलत भी चाहिए,और शोहरत भी; जो कहते कभी थे,के हम मन देखते हैं। इश्क़ हुआ भी,और जो इश्क़ के भी न हुए; दोष ऐसे लोगो का सीधे,भगवन देखतें हैं।

आधा क्या।

 हममें तुम हो,तुममें हम हैं,हमदोनों में आधा क्या। राधा बिन कृष्ण नहीं हैं,कृष्ण बिना भला राधा क्या। स्नेह का कोई रूप नहीं हैं,विरह से बड़ी न वेदना,; प्रेम में अगर देह नहीं हैं,फिर"प्रेम में हैं बाधा क्या। तुमने उसको देखा हैं,माना सर से लेकर पांव तक; अगर मन को नहीं देखा,तो"तुमने आख़िर साधा क्या। देने में अब उलझन कैसी,जब प्रेम से हमें थामा हैं; प्रभु से जब मांगें कोई,कम क्या हैं और ज्यादा क्या।