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लाचारी

 पैर बंधे,हाथ खाली,सर पर'सौ जिम्मेदारी होती हैं। यूँ ही छूट नहीं जाता ईश्क़,कुछ तो'लाचारी होती हैं। माँ का ख़्याल रखना हैं,भैया की उम्मीद भी रखनी हैं; वादा किया है मिलनें का,उनकी ज़िद भी रखनी हैं। कई उलझन होते हैं,जब दिल की बीमारी होती हैं। यूँ ही छूट नहीं जाता ईश्क़,कुछ तो'लाचारी होती हैं। घर से हमें निकालों नहीं,कुछ फूल पसंद तो आयेंगे ही। पापा इस अंजुमन में,कुछ मकबूल पसंद तो आयेंगे ही। कैसे मैं समझाऊँ,दिल पर न'सबकी दावेदारी होती हैं। यूँ ही छूट नहीं जाता ईश्क़,कुछ तो लाचारी होती हैं।

गवाही

मेरी शोख़ी,मेरी मस्ती,मेरी उड़ान ले लेगा। इतना चाहता हैं की, तू मेरी जान ले लेगा। वक़ालत ईश्क़ में तेरी,यहाँ काम न आएगी; महबूब जो चाहेगा तुमसें,वो बयान ले लेगा। ईश्क़ हुआ,तो'बिमारियाँ कुछ कर नहीं पायेंगी; ईश्क़ ख़ुदा से भी,जंग सीना तान ले लेगा। यूँ तो उतरेगा दिल में,ये साहेब'बहुत धीरे से; शोर मचाएगा ऐसा की,तेरी पहचान ले लेगा।

पीतल

अपने प्रेम की ठंडी से,सनम'तुझकों शीतल कर दूँगा। सोने को भी ये डर हैं,के मैं उसको पीतल कर दूँगा। प्रपंचों की इस दुनीयाँ में,ग़र तुमको गंगा होना हैं; तो'मैं अश्रुजल से धोकर,तुमकों निर्मल कर दूँगा। जिनको भी ये खुशफ़हमी हैं,के तुम मेरे अब रहें नहीं; दिल को जब दिखाऊंगा,तो'सबको पागल कर दूँगा। नङ्गी है तहज़ीब जहाँ की,तुम्हीं बताओ गंदा क्या हैं; जिश्मों की इस संधी में ना,मैं मन को ओझल कर दूँगा। माना मैं हुँ बूंद सही,यहाँ मेरा कोई वजूद नहीं; तुमसें जब मैं जुड़ जाऊँगा,तो'तुमकों बादल कर दूँगा।

सवाल

सवाल बहुत खुली नहीं ज़िंदगी, बहुत से सवाल हैं। मगर यकीन करना, तुमसे मोहब्बत कमाल है। अब इस मोड़ पर अलग हुए तो कुछ न बचेगा; साथ हुए तो हम सर्प हैं, तू नाज़ुक चंदन की डाल। ख़्वाइश थी मेरी फिक्र में, कोई खुद को तबाह करें; तू कहीं तबाह न हो जाए — अब ये डर है, मलाल है। यकीनन बहुत टूटकर अक्सर चाहती हैं लड़कियाँ; कोई उन्हें रुसवा करे,तो"कातिल है, चंडाल है। हम ज़माने के हिसाब से,सनम कभी चलें ही नहीं; कलम है मेरा सहारा,मेरे शब्द अब मेरी ढाल है। अब ये न कहना कि मेरा ख़्याल तुम रखते नहीं; मर गए होते अगर,कभी तुमसे हुए जो बेख़याल हैं। कितनी राधाएँ विरह में रहीं, और कृष्ण बंजारे रहे; इश्क़ वो बताते हैं हमें, जिनकी खुदगर्जी मिसाल है। काट रहा हुं ज़िंदगी, मैं होकर बेमज़ा बेस्वाद-सी;  कह रही हो,के तुम रुको,बाकी अभी छह साल हैं। माना तुम ग़र जज हो भी गए,तो"हम क्या करेंगे; इश्क़ का दायरा तो बस चंद बच्चे और रोटी-दाल है।

चाहत

 लिपटकर डाल सी बृक्ष का,होना चाहती हुँ। उठा लें बाहँ में मुझकों,मैं सोना चाहती हुँ। बहुत आए बहुत गए,तेरे यादों के मंज़र; तु गर मेरा हो जाए,तो'मैं तेरा होना चाहती हुँ। पिघलकर बूंद बन जाऊँ,या कोई दरिया सा; तूने इतना परखा दिल को,के मैं रोना चाहती हुँ। उम्रभर साथ रहें,मेरा हर पल दिल बहलाए; बहुत बेशकीमती नहीं,मैं जिंदा खिलौना चाहती हुँ।

जिज्ञासू

 कई ठगें जायेंगे,और कई जिज्ञासू होंगे। प्रेम पथ के पग में,घोर निराशा आँसू होंगे। ये तो जगज़ाहिर हैं,जिसे यहाँ ठगना होगा; दिखनें में वो सादा होगा,शब्द उसके धांसू होंगे। कुछ वार करेंगे सिधे,कुछ बातों से लुभाएंगे; जो प्रेम से लूटेंगे,वो असली रक्त-पिपासूँ होंगे।

मुशलमाँ

 तुम्हें मालूम भी नहीं,की तुम क्या कर दोगें। इस काफ़िर को सनम,मुसलमाँ कर दोगें। बुरे लोगों को भी यहाँ,जन्नत मिल जाए; तुम हाथ उठाकर,अग़र'दुआ कर दोगें। हमसें पूछों न मोहब्बत की ताबीर सनम; तुम चाहोगें,तो'काँटे को गुलिशतां कर दोगें। मुझें भरोसा हैं,यक़ीनन तुम आओगें एक दिन; और मिलकर मेरा गम,सब हवा कर दोगें। तुमसें पहलें यहाँ हम,बहुत तन्हा थे कभी; अब मिलकर बिछरोगें,तो'और तन्हा कर दोगें।