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मोड़

 जमानें की ऊँचाई,दौलत को छोड़ कर मिलतें हैं। चलो न फिर से,उसी गली,उसी मोड़ पर मिलतें हैं। लाख़ हासिल किया,मग़र बचपन का सुकूँ न मिला; फ़िर बारिश में,कागज़ की नाव झंझोर कर मिलतें हैं। 70 की जिंदगी में भला,कितनी परवाहें करें हम; आओं न सारी दुश्वारियाँ,मर्यादाएं तोड़ कर मिलतें हैं। हमारें हौसलें से जो अरमाँ सनम,यहाँ पूरें नहीं होंगें; वक़्त का क्या हैं,ये देता है तो'सब मरोड़ के मिलतें हैं।

गज़ल

जख़्म हरा और,आंखें" जिनकी सजल न हुई। वो भलें लाख़ लिखें,उनसे मग़र"ग़ज़ल न हुई। मेरे बग़ैर बहुत जतन किए थे,उस लड़की ने; मेरी खुशबू से न गुजरी,तो'फिर"कमल न हुई। आज भी उलझी हैं वो लटें,जो सुलझाई थी कभी; हमने छोड़ा तो फिर"वो लटें,कभी सरल न हुई। आँह से सींचा,आसुओं से वो बोया गया होगा; यक़ीन मानिए,यहां यूँ ही उम्दा नश्ल न हुई। ये तो वहम है कि,यहाँ तू भी"महल था कभी; आज खंडहर है,और खंडहर फिर महल न हुई। आंखरी दौड़ था,एग्जाम हुआ,कॉलेज बदल गए; बस इत्ती बात पे,इश्क़ की पहेली हल न हुई।

कमाल

 जब भी उसको मेरा ख़्याल आएगा। मुझें मालूम हैं,ईश्क़ कमाल आएगा। भलें वो आज बच जाए,मेरे सवालों से; कल हम हीं को ढूंढेगा,मलाल आएगा। पहाड़ों की गोद में ही,नदी बसती हैं; लाख़ परखेगा,होकर निढाल आएगा। जुदाई की बेला हैं,आज दिल छलनी हैं; मग़र'मेरे हिस्सें भी,अच्छा साल आएगा। यूँ कहीं जाएगी,हमदोनों की कहानीयाँ; ईश्क़ में जब भी,बेहतर मिशाल आएगा।

बहाना

 रिस्ता छूटें तो'यक़ीनन,कोई बहाना होता हैं। वो चला ही जाता हैं,जिसकों जाना होता हैं। ये बात ज़रा तुम समझों जी,शब्द भी मेरे टूटेंगे; ईश्क़ में शब्दों को,दिल का भार उठाना होता हैं। फ़िर याद तेरी आ जाए,फिर कैसें तुमकों ढूँढुंगा; आँख ग़र जागें भी,तो'ज़िशम को सुलाना होता हैं। इक भूख हमारी रहती हैं,तब जाकर ये मिटती हैं; दूर तलक ही रहकर जब,तेरे मुँह में खाना होता हैं। जो बात तुम्हारी मानें,वो यहाँ हरगिज़ तेरा हैं नहीं; जो तुझसें भी लड़ जाए,वो महबूब सयाना होता हैं। पहलें खुद को खोना हैं,फिर दिल से उनका होना हैं; दिल ही ये समझता हैं, क्या ईश्क़ निभाना होता हैं।