मोड़
जमानें की ऊँचाई,दौलत को छोड़ कर मिलतें हैं। चलो न फिर से,उसी गली,उसी मोड़ पर मिलतें हैं। लाख़ हासिल किया,मग़र बचपन का सुकूँ न मिला; फ़िर बारिश में,कागज़ की नाव झंझोर कर मिलतें हैं। 70 की जिंदगी में भला,कितनी परवाहें करें हम; आओं न सारी दुश्वारियाँ,मर्यादाएं तोड़ कर मिलतें हैं। हमारें हौसलें से जो अरमाँ सनम,यहाँ पूरें नहीं होंगें; वक़्त का क्या हैं,ये देता है तो'सब मरोड़ के मिलतें हैं।