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आबरू

 हरा दें मुझकों,तुझको अगर सुकूँ मिलें। इससे पहलें की,आंखों में मेरे खूँ मिलें। कुर्बानी तब कोई यहाँ,समझेगा भला; जब किसी लहू में,उसका भी लहू मिलें। राह आसान है,मंजिल मुश्किल नहीं हैं; बसर्ते हौसलें के साथ,तेरा भी जुनूँ मिलें। अब आदमी में ही होता है,भेड़िया कोई;  ख़ूब परखिए,होकर तभी ज़ुस्तजू मिलें। हमें जन्नत से सनम,नहीं रखना वास्ता; जन्नत मिल जाए यहीं,मुझें अगर तू मिलें। खाम-खाँ जिंदगी बड़ी हो, क्या फायदा; हो जिंदगी छोटी सही,मग़र आबरू मिलें।

ख़ुमार

ख़ुमार मेरे दिल में सनम, दर्रे-दीवार होने तक। अब हम देखेंगे तुझें,सनम प्यार होने तक। पिलाता है साक़ी,तो'कुछ इस तरह पिला;  मज़ा आए मुझें,अपने ख़ुमार होने तक। दिल से यक़ीनन तुम,गर चाहों किसी को, फ़र्क़ नहीं पड़ता,फिर'दरकिनार होने तक। फ़ैसला तेरा है,तु कुरेदें या सम्भालें हमें; बंदा हाज़िर हैं,अब दिले-बीमार होने तक। उतरकर देखिए,इश्क़ इतना आसाँ न है, वो आज़माती रहीं है,इख़्तियार होने तक। मेरी सब्र का तुम्हें,सनम अंदाजा नहीं है; हमनें तीर को चाहा है,तलवार होने तक। कोई तो हो,जो उनकी अहमियत समझें; किसी ख़बर को,यहाँ अख़बार होने तक। यूँ टूटने को तो'कोई भी,रिस्ता टूट जाता हैं; मग़र मैंने सम्भाला है,उसमें'दरार होने तक।

कमी

बिछड़कर दोनो को,मग़र' कमी खलेगी। मुझें आसमान खलेगा,तुझें जमीं खलेगी। किसी का होकर भी,कीसी का न हो पाना; यकीन हैं इन दस्तानों में,ये जिंदगी खलेगी। बदलकर भी तुम अभी,बदल न पायी हो; बेवफाई में भी तुझें,मेरी आशिक़ी खलेगी। रुलाकर हमें आज,जा रहीं हो भलें मग़र' तेरी महफ़िल में,सबको मेरी हँसी खलेगी। सभी को यहाँ,नयी अदाओं का लगाव हैं; ईश्क़ पुराना होगा,उसे तु हमनशीं खलेगी। इक रिश्ता दिल का,तुमसें निभाया न गया; कौन संभालेगा जब,आँखों की नमीं खलेगी।

कशक़

दूर रहकर भी,यादों की महक़ रहती हैं। बगैर जिंदगी में उसके,इक कसक रहती हैं। मिल जाए अगर कुछ,ख़्वाईश से ज्यादा, ये मुनासिब है,की उसपर'हमें शक़ रहती है। वो ठुकराकर मेरा ईश्क़,पामाल कर देगा; इसी गफ़लत में वो लड़की,बेशक़ रहती हैं। खुसी की ख़ातिर,कोशिशें करनी पड़ती हैं। आकर जिंदगी में गम,तो'अचानक रहती है। हमारे साथ की गवाही,देता यहाँ हर मौसम; जो आज मिलकर मुझसें,भौंचक रहती हैं। तैयारीयाँ खूब करों,किस्मत नहीं बदलनेवाली; राह में ठोकरें और मंजील,एकाएक रहती हैं।

भुलाया

अश्क़ पलकों से जब,उठाया जा सकता हैं। ये मुमकीन है तुम्हें,भुलाया जा सकता हैं। मेरे मानिंद जहाँ जी रहें हो, और भी लोग; बात दिल की वहाँ,बताया जा सकता हैं। औरतें बेलिबाज,मर्द बेतकल्लुफ़ हो जाए; साथ रहकर भी,जुर्म ढाया जा सकता हैं। वो मेरा ख्याल करें,हम उसका ख़्याल रखें; चन्द रिस्तो को यूँ भी,निभाया जा सकता है। ईश्वर की मर्जी हो,तो'हर जर्रे में वो दिखता हैं;  पथ्थर को भी,फूलो से सजाया जा सकता है। वक़्त के पैबंद है यहाँ,हर कंकड़,हर मोती; सूरज को भी,रोशनी दिखाया जा सकता है। ईश्क़ अग़र जुनूँ की हद से,यक़ीनन हो जाए; बहुत मुश्किल है की,समझाया जा सकता है।

सलामत

 जो दर्द दें,उसकी सलामत करता है कोई। मेरी तरह भी,क्या मोहब्बत करता है कोई। वो साथ देगा,तुम इस भरोसें पर नहीं रहना; भला कहकर भी, हिफाज़त करता है कोई। दिल में उतरनें तक, सारी साफगोई रहती हैं, उतरकर दिल में,कहाँ शराफत करता हैं कोई। कुछ कर नहीं पाते,पेट की ख़ातिर जीनेवाले; बहुत टूटकर ही यहाँ, क़यामत करता हैं कोई। अज़ब है प्रेम की दुनियाँ,गज़ब है प्रेमवालें लोग; एक ही से,मोहब्बत और हीराक़त करता हैं कोई।

मरहम

 खुसी भी बेच देता हैं,गम भी बेच देता हैं। हमे जख़्म देकर,अपना मरहम बेच देता है। मेरा पाला पड़ा है,ज़नाब' ऐसे शागिर्दों से☺️ रोज मिलकर,मेरा ओहदा-करम बेच देता हैं। बीमार हो तो,ये कोई नई बात नहीं गरीबी में; अब जिंदा है वही,जो अपना धर्म बेच देता हैं। ख़्याल किस-किस का करेगी,सियासत भला; साख पर पड़ती हैं,तो'वो भी वहम बेच देता हैं। खरीदार मिलतें कहाँ हैं, मुफ़्लिशी के दौर में; चालाकी उसकी है,करके बातें नरम बेच देता हैं। वो यूँ हराता है मुझें,यहाँ अपनी अदाओं से; साग़र को रोकर,अपनी आँखें नम बेच देता हैं। हाल वही होगा हमारा,जो औरों का हुआ हैं; काम चलता रहें,रोज सिस्टम भरम बेच देता हैं।

इरादा

बेशक़ उनको इसका,अन्दाजा नहीं रहा होगा। मेरा दिल तोड़ने का,उसे इरादा नहीं रहा होगा। सुना हैं प्यार तुम भी,यक़ीनन करती हो किसी से; प्यार होगा भी तो'हमसें,उसे ज्यादा नहीं रहा होगा। तेरे गली का हर पान वाला,यह मेरी गवाही देगा; तुमसे पहलें सागर इतना,सीदा-सादा नहीं रहा होगा। पिटा था कभी मैंने,यहाँ तेरे मौसी के बेटे को भी, प्रणाम उनको,किया सौ से ज्यादा नहीं रहा होगा। माना तु B. tech हो,मैं 7 सालों से सनम इंटर में; मग़र बता'किस प्यार में यहाँ,बाधा नहीं रहा होगा। जो बताते हैं तुमको,की मेरा रहा करैक्टर ख़राब हैं; किसने पिया यहाँ,मेरा दोस्त' आधा नहीं रहा होगा।

राम

 होकर भावों से,निष्काम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना,राम बहुत आयेंगे। राह लगें शुलों को,फेंको न सुखें फूलों को, यादों के खुसबू के,ये काम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना, राम बहुत आयेंगे। अभी  ईश्क़ नया हैं,अभी से टूट गया हैं। वेदना के बेला के,यहाँ शाम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना, राम बहुत आयेंगे। अबतक जख़्म हरा हैं,समझों ईश्क़ बड़ा हैं। देख इन्हें तन्हाई में,आराम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना,राम बहुत आयेंगे। तेरे रुकनें तक,सूरज भी नहीं निकलेगा; मेहनत की राहों में, घाम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना,राम बहुत आयेंगे। बिकने को तैयार हैं,ख्वाबों का रंगमहल; कुछ पल रुक जातें,तो'दाम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना,राम बहुत आयेंगे। ईश्क़ के खुमारी में,हैं नौकरी की तैयारी में; शादी की हाँ नहीं कहना,नाम बहुत आयेंगे। तुम मर्यादा में रहना,राम बहुत आयेंगे।

नादानी

 जिन गिरती हुई बूंदो को,तु नादानी कहती थी मेरी माँ उसे,सनम' आँख का पानी कहती थी। मिल जाता था हर राजा,आँखिर में अपनी रानी से; झूठी थी वो कहानी,दादी जो कहानी कहती थी।

सिहरन

 डर जाते है,उठ जाते है,सिहर जाते हैं। जब भी तेरे ख़यालों में,हम उतर जाते हैं। दिन के सायें में जितना,समेटा करते हैं रात तन्हाई में,उतने ही' बिखर जाते हैं। मिलकर भी किसी से,अब मिल नहीं पाते; इतने खोए रहते है,जब हम घर जाते हैं। पिता परेशान हैं,माँ अब हैरान रहती है; फूल मांगा जाता है,लेकर पथ्थर जाते हैं। ना बनाइए साहेब,समंदर से यहाँ रिस्ते; किनारों के घर,तो'आँखिर में उजड़ जाते हैं। बादस्ता जारी हैं, मेरी गाँव का जमघट; खबर आज भी बनती है,वो किधर जाते हैं।

टूटने के बाद

 प्यास और बढ़ जाती हैं,लबों से छूटने के बाद। भला इतना भी कोई टूटता हैं,यहाँ टूटने के बाद। कसक आज भी सताती है,मुझकों इस बात की; वो और मासूम लगती थी,मुझसें रूठने के बाद। अच्छा भला था,मैं यहाँ तेरी मोहब्बत से पहलें; अब तेरे लोग हाल पूछतें थे,मुझें कुटने के बाद। सच्चा आशिक़ वही,अक्सर यहाँ माना जाता हैं; जो और हिम्मत दिखाता है,कालिख़ पुतनें के बाद। पलकों पर बिठाया था,तुझको ख़ुदा बनाया था; बस पूछना था,क्यूँ गीर गए,इतना उठने के बाद। माना साँसों से जुड़ी है,जीवन की हर इक डोर; हवा भी जालीम लगती है,यहाँ बहुत घुटने के बाद।

सर

कंधे बड़े नाज़ुक थे,उनपर सर रख नहीं पाए। जो अमीर थे बच्चें,पिता का घर रख नहीं पाए। यूँ तो ख़बर रहती थी,यहाँ उनको जमानें की; मग़र अपनें बच्चों पे,वो नज़र रख नहीं पाए। शहर जाकर,कुछ इस कदर'मशगूल हुए बच्चें, यूँ तो खुद बस गए,पिता को शहर रख नहीं पाए। बस इतनी शिकायत हैं, मेरी शहर जानेवालों से, क्यूँ वो जाकर शहर,गाँव की ख़बर रख नहीं पाए। मैंने महबूब को लिखा,तो'यहाँ ख़ूब हुई गज़ल; पिता को लिखना चाहा,तो'बहर रख नहीं पाए। माँ से जब भी मिला,चिंता रही सिर्फ़'उसको मेरी, बात नाकाफ़ी रही,हम अग़र-मग़र रख नहीं पाए। यूँ बंदिशें अच्छी नहीं लगी,कभी उस उम्र में हमें, घर से जो दूर हुए,तो'घर का हुनर रख नहीं पाए। कभी इक घर में पलता था,4 भाईयों का परिवार; बच्चें इतने मॉडर्न हुए की,एक मेहर रख नहीं पाए।

जवाब

 इन सुखें हुए फूलों में,गुलाब नहीं आएगा। अब लगता हैं उनका,जवाब नहीं आएगा। हम उनके ख़्याल में,यूँ ही जी रहें थे अबतक; यक़ीनन अब होकर,वो शादाब नहीं आएगा। नाराज़गी होगी,तो'उम्रभर निभाई जाएगी, हुई अग़र गलतियाँ,अब'आदाब नहीं आएगा। रिस्ता कोई भी हो,सौदागिरी का आलम ये हैं; ईश्क़ हुआ भी,तो'ईश्क़ बेहिसाब नहीं आएगा। फ़र्ज सभी निभा रहें हैं,यहाँ अपना- अपना; पतझड़ के मौसम में,कभी सुर्खाब नहीं आएगा। अब जरूरत हैं,यहाँ'जान लगाकर लड़ने की; घर की अगर सोचेंगे,तो'इंकलाब नहीं आएगा। कभी भेजें थे ख़त,हमनें किताबो के बहानें; जवाब ये आया हैं, की किताब नहीं आएगा।