संदेश

जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क़िताब

बेमतलब उसूलों की,क़िताबों की दुनीयाँ। कभी तो होगी,अपनें हीसाबों की दुनीयाँ। जिंदगी के दौर में,इतनें आगें निकल गए, कहाँ गया वो बचपन,ख्वाबों की दुनीयाँ। अब हर चेहरें में,यहाँ इक चेहरा लगा हैं; हैं रंगते बदलती,ये नक़ाबों की दुनीयाँ। हम शाख़ के पत्तें हैं,इक दिन झर जायेंगे; तुमको ही मुबारक़ हो,गुलाबों की दुनीयाँ।

सम्भाल कर रखा

 यहाँ सबनें अपने हीसाब का,खंज़र संभाल कर रखा। दोस्त मिलें ऐसे,फूल फेंक दिया पथ्थर संभाल कर रखा। हालात बहुत बदलें,यकीनन तुमसें अलग होने के बाद; फिर भी'मैंनें तेरी यादों का,हर इक मंज़र संभाल कर रखा। तेरे बग़ैर कुछ भी नहीं,मेरे ख़ातिर ये बहारों का मौसम, जो तेरे साथ गुजरा है हमनें वो पतझड़ संभाल कर रखा। मिली बाज़ार में वो आज मुझकों,मेरा ही ख़रीदार बनकर; जिसके लिए ही सबकुछ,मैंने मेरे रहबर संभाल कर रखा।

लड़की

मेरे बुरे दौड़ का,अच्छा ख़्याल थी वो लड़की। बड़ी आँखें,भड़ा बदन कमाल थी वो लड़की। बाजार कितना खुलेगा,आज वो आएगी की नहीं; सबकी नजर का बस वही,सवाल थी वो लड़की। हसरतें हज़ार थी,हासिल भी हमें लाख़ हुआ; मग़र उम्रभर की कसक, मलाल थी वो लड़की। सादगी,हुनर मिलाओ,फिर'उसपर हुस्न सजाओं, ईश्वर की कारींदगी की,मिशाल थी वो लड़की।

साहेब

 गिला काँटों से नहीं,हैं गुलाब से साहेब। कितनें बदलें जमानें के,हीसाब से साहेब। Fb, whatsup से कुछ नहीं होने को हैं; बदलेगी किस्मत यहाँ, किताब से साहेब। जज़्बाती रिश्तों में ज़रा,उतरकर तो देखिए; आँसू में जलन ज्यादा है,तेज़ाब से साहेब। तुम्हारा आना भी,इतना बेकस गुजरा हैं; कितनें मर गए ख़्वाब,तेरे ख़्वाब से साहेब।

सिख रहा हुँ।

 दूर रहकर भी,रिस्ता निभाना सिख रहा हुँ। बग़ैर तेरे मैं,यहाँ मुस्कुराना सिख रहा हुँ। कल जो बात तुमनें कहीं थी,मुझें हल्के में; उसी राह पे,मैं खुद को चलाना सिख रहा हुँ। मोहब्बत ये भी है,के ज़िद नहीं किया जाए; ढ़लकर तुझमें,अपना बनाना सीख रहा हुँ। अभी जिंदगी मेरी वास्ते,मोहरें सजा रही हैं; अभी तो जिंदगी का,ताना-बाना सिख रहा हुँ। जहाँ ठोकरें हैं,उसी राह से हैं मेरी मंजिल; गीरकर मैं वही से,आना-जाना सिख रहा हुँ।

रौशनदान

 जो अंधेरा हैं,रौशनदान में नहीं आएगा। इतना बदलेगा,के पहचान में नहीं आएगा। उम्र बाकी हैं अभी किस्मत बदलनी है हमें; सागर अब,बाबू,सोना,जान में नहीं आएगा। हालात जैसे हो,खुद को आज़माना पड़ेगा, नाव किनारें,सिर्फ' तूफान में नहीं आएगा। काटनी है तो जिंदगी,तेरी भी कट जाएगी; मग़र यहाँ शोहरत,तुझें दान में नहीं आएगा।

काबिल

कभी समंदर नहीं,तो'कभी साहिल नहीं समझा। मैं हुँ नहीं काबिल,अगर तुने काबिल नहीं समझा। पिता नौकरी में थे,मैं अच्छी नौकरी करता हुँ; किस काम का हैं ये जब,तेरा दिल नहीं समझा। के वार दिल पे किया उसनें,दिल के मरीज़ पर; दिल में वो भी था,ये मेरा क़ातिल नहीं समझा। बतातें किसको भला,अपना हाल-ए-दिल बयाँ; मेरा दर्द,रहा जो दर्द मेरे,शामिल नहीं समझा। मोहब्बत पे तोहमत लगें, ये मुझें मंजूर न था; बात अपनी कह गए,मेरा मुश्किल नहीं समझा। सुकूँ के वास्ते,दो दिलों का मिलना काफी हैं; सच में हैं क्या करना,तुनें हासिल नहीं समझा।