संदेश

दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उतर

 मिलकर अबके उससे,ऐसे बिछड़ जाना हैं। दिल से उतर गए हैं,नजर से भी उतर जाना हैं। मोहब्बत भला  किस मोड़ पे,फिर"दस्तक दे दें; इक ने छोड़ा हैं,दूसरे ने पूछा है किधर जाना हैं। उन लॉन्डो के हाथ,घर की इज्जत न सौंपिए; जिन्हें शहरी होना हैं,हर हाल मे शहर जाना हैं।

लरके

 समंदर चाहकर भी,हाथों से न"उठाए जातें हैं। लड़के छोड़े नहीं जाते,बस ठुकराए जातें हैं! अक्सर जिनके पैरों तलें,फूल कुचलें जाते हैं; उन्हीं को पाने की ख़ातिर,अकुलाएं जाते हैं। जो बंदा दिल से किसी का, होकर रहता हैं। वही मूर्ख उनकी महफ़िल में,बताए जातें हैं। भला कोई बेहया, मुझें क्या नुकसान करती; ये तो हया हैं मेरे,अंदर से"मुझें खाए जाते हैं।

चंदन

 लड़ेंगे इस तरह,के काल भी वंदन करेंगे। हम अबकी खून से,उनके चंदन करेंगे। कुछ काम मेरे बाजुएं,मेरे हौसलें करेंगे; कुछ काम मेरी थाप,मेरे स्यनदन करेंगे। लोग चीखों से यहां आज़ीज़ हो जाएंगे; के जो बच जाएंगे,इतना क्रंदन करेंगे।

अधिकार

 ये दिल तो उसी का होकर रहा, हां! जिस्म पे कई अधिकार हो गए। नाव ने ही,साथ निभाया नदी का; लोग नाव सहारे,बस गंगा पार हो गए। जो रिश्ता निभाता रहा,बेज़ार ही रहा; दिल छलने वालें,सारे होशियार हो गए। ये सूट-बूट,ये रुतबा,रईसी दिखती हैं; हम आदमी से,सजतें हुए व्यापार हो गए।

Suraj

 सूरज नहीं हुए तो हम निशाँ नहीं होंगे। हम किसी के दर्द का सामां नहीं होंगे। तेरे आंखों का नूर सनम,गर बन न सकें; तो"चले जायेंगे,आंख का कांटा नहीं होंगे। अब तो"ये तय हैं,तुम रहोगें या कोई और; मोहब्बत में दिल हमारेंं, साझा नहीं होंगे। जिन्हें किसी इक का गर होकर नहीं रहना; कोई मर भी जाए,उनकी नज़र उम्दा नहीं होंगे। कत्ल गर कटार से हो तो बच भी जाए कोई; जो प्यार से हैं मारें गए,फिर"जिंदा नहीं होंगे।

Harami

 कुछ तेरी सादगी हो,भले उसमें लाख खामी हो। मैं नहीं चाहता मेरे बच्चें,बिल्कुल हरामी हो। मेरे खून के उबाल को,कम करने की जरूरत हैं; कौन चाहेगा आंधियों के बाद,फिर" सुनामी हो। तेरी जुल्फें,तेरी आँखें,तेरे डिम्पल,तेरा लहज़ा; हो जाए इक भी अदा,तो"देखें उसे हैरानी हो।

खबर

 मैं जिधर देखता हुं,वो उधर देखती हैं। लगता हैं मुझें,उसकी नज़र देखती हैं। शब्द तक उठकर,उसे देखनें लगते हैं; अख़बार उठाकर जब,वो ख़बर देखती हैं।

बगावत

 जिस तरफ सब हैं,नहीं"उस तरफ नहीं जाना मुझकों। जो बगावत कर सकें, उसी से हैं रिश्ता बनाना मुझकों। कोई ग़रीब लड़का,कबतक"जुल्फें संवारता फिरता; मोहब्बत थी मग़र था,घर के लिए भी कमाना मुझकों। अपनी हैसियत मुताबिक़,जितना देता,दे दिया था उसे; ये मोहब्बत कैसी,जो फिर भी"दे रहीं है ताना मुझकों। बुरे दौड़ में भी वज़ीर थे, अच्छें दौड़ में सोचों क्या होतें; ज़रा सब्र करतें,तुमने जाना भी,तो" नहीं जाना मुझकों।

बुनियाद

 यकीं मान मैं दिल की बुनियाद हिला देता। तू मुझको भी,तो"काश महफ़िल में बुला लेता। या तो तेरी उम्रभर के लिए दोस्त हो ही जाती; या तो मैं वहां सबकी, आँखों को रुला देता। चल हट बहुत हुआ,अब कितनी मिन्नत करेगा; इससे अच्छा मर जाता,या उसको भुला देता। दुनिया नाचीज़ इस दिल को,कब समझी हैं; गर तू उसके मज़े लेता,तो"अच्छा सिला देता।

शाम

 मैं सुहानी शाम हुं,सनम"सवेरा नहीं हो सकता। अब तू मर भी जाए,तो"मैं तेरा नहीं हो सकता। याद तो तेरी आएगी,मुमकिन है के मैं रो भी दूं; मग़र इतना गिरकर भी, बसेरा नहीं हो सकता।

गैरजरूरी

 एहतियातन गैरजरूरी थे हम। उनके लिए बस मजबूरी थे हम। फिर भी"वो यूं साथ निभातें रहें; जैसे बेफिजूल थे,जरूरी थे हम। मेरे बाद उनमें भी वो खनक न थी; कभी उनकी कलाई के चूड़ी थे हम। मिलने वालों के,नज़रिए में फर्क था; कहीं फूल थे,और कहीं छुरी थे हम।

आसरा

 जो लुट चुके हैं उनका भी हो" आसरा कोई । अब हमारी जिंदगी में,आ गया है तीसरा कोई। ए ख़ुदा सबकी मोहब्बत को,ऐसा अंजाम दें; बिछड़े नहीं,जब किसी का हो इक दफा कोई। मिलें गर हम तो सनम,कुछ इस तरह रहेंगे; जैसे इक ही धागे के हो,हम- तुम सिरा कोई। वो भी आबाद रहें, ख़ुदा"जिन्होंने दिल तोड़ा हैं; चाहकर नहीं होता हैं,दोस्त"यहां बेवफ़ा कोई।

उम्र

 उम्र जिस पायदान पे, मुझें आंखें दिखा रहा हैं। इस दौड़ में भी"इक शख़्स,दिल को लुभा रहा हैं। सिख चुके थे हम,दुनिया की हर चालाकियां साहेब; बड़ी बेबाकी से अनाड़ी,मुझें तब दिलवर बता रहा हैं। मेरे तजुर्बे को आकर जैसे,यूं ख़ाक कर रहा कोई; जैसें दिल को लग रहा हैं  फिर"बच्चा बना रहा हैं। ए आदमी तेरी भला,दुनिया में"विसात ही क्या हैं; ये इश्क़ हैं,इसके आगे ख़ुदा भी" बौना रहा हैं।