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सैलाब

 थे कचनार से,शोहराब से लोग। थे उनके शहर सारे गुलाब से लोग। जहां की मिट्टी भी खुशबूदार हो; क्या बताए कैसे थे,महताब से लोग। और उन्हीं में इक कली दिखाई दी; जैसे बादलों में हो आफ़ताब से लोग। मैं बस वही दोस्त,दिल हार आया था; डूबे थे जिन आंखों के सैलाब से लोग।

दिलनशीं

 #दिल की बात मैं, दिलनशीं से कैसे कहता। ये उसी की बात थी,उसी से कैसे कहता। जो भी जानता तुम्हें,तुमसे मोहब्बत कर बैठता; तुमसे मोहब्बत हैं,हर किसी से कैसे कहता। मेरी नज़र यहां दोस्त,शहर की रानी पर हैं; उससे शादी करनी हैं,मुफलिशी से कैसे कहता। मां ने दिखाए हैं हाथ मेरे,शादी में क्या अर्चन हैं; अर्चना से करनी हैं शादी,ज्योतिषी से कैसे कहता।

हिचकियां

तुम गए ऐसे जैसे,ले गया हो कोई मेरा दिल,गुर्दा,मेरी अतरियां सारी। और तेरी बेवफाई पे,जो चंद शेर पढ़े, दाद देने लगी मुझे लड़कियां सारी। इतना आसा नहीं हैं,तुम्हें भूलना सनम; तुम्हें ढूंढने लगी हैं,मेरी हिचकियां सारी। अब तो अपने घर में भी,ऐसे रहते हैं  घूरती है मुझे,दरवाजे खिड़कियां सारी। जब तलक़ इश्क़ के मसलें से निकलते, खत्म हो चुकी थी,सरकारी भर्तियां सारी।