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तमन्ना

 होती अम्बर में तू,तो"चांद कोई,रत्नों में तो तू पन्ना हैं। अब कैसे तुझें समझाऊं के,देखने की तुम्हें तमन्ना हैं। होती फूलों में तो गुलाब कोई,मौसम में हो सावन तुम। शहरों में होती कश्मीर,होती नदियों में गंगा पावन तुम। तेरे होने से"फकीरी मिट जाए,न तुमसा कोई धन्ना हैं। अब कैसे तुझें समझाऊं के,देखने की तुम्हें तमन्ना हैं।

संयोग

 प्रेम स्नेह बंधन हैं,प्रेम निश्चल भावों का योग हैं। माना प्रेम में पीड़ा हैं,मगर"मिलना प्रेम संयोग हैं। प्रेम में हैं वो जीवनरस,जो प्रेम पिए मतवाला हैं। प्रेम बिना समझो जीवन,जैसे खाली प्याला हैं। मन पावन तो प्रेम गंगा हैं,हो कुंठित तो रोग हैं। माना प्रेम में पीड़ा हैं,मगर"मिलना प्रेम संयोग हैं। [हो प्रेम तो हो मीरा सा,या हो राधा की पीड़ा सा; तुम भावों में उतरों तो"यहां कौन नहीं हैं हीरा सा; मन भावे तो देह ईश्वर हैं,नहीं तो"देह बस भोग हैं। माना प्रेम में पीड़ा हैं,मग़र"मिलना प्रेम संयोग हैं।

जनाजा

 हैं यहीं वक्त का तकाज़ा,तो"तकाज़ा उठातें हैं। आईए मिलजुल हम इश्क़ का,ज़नाज़ा उठातें हैं। फ़रवरी रोजगार का मौसम नहीं,जो उन्माद में हैं; अब बच्चें क़िताब छोड़कर,फूल ताज़ा उठाते हैं। तुम्हारी उम्र हैं तुम भले खूब,यहां महबूब बनाओ; हम घर के बड़े हैं,जिम्मेदारियों का ही मज़ा उठाते हैं। मोहब्बत क्या ही भला करेंगे,अब इस दौड़ के बच्चें; हम उस दौड़ के महबूब की,आजतक रज़ा उठातें हैं। यक़ी मानिए असली मोहब्बत, होती इसी में हैं; के हम पीछे चलते हैं,उनका आँचल,दुपट्टा उठातें हैं।

मर्यादा

 जो ही हैं कम ही हैं,कलयुग में ज्यादा क्या हैं। लोग राम को बतलाएंगे,यहाँ होती मर्यादा क्या हैं। कृष्ण भी होंगे ऐसे,के गोपियां जान बचाएंगी; मुन्नी शीला के दौड़ में,न पूछो"होना राधा क्या हैं। रावण सीता मिलकर दोनों,लक्ष्मण पे बाण चलाएंगे। और चीरहरण के खातिर,कितने द्रौपदी ललचायेंगे। दुशासन की इज्जत होगी,चीरहरण में बाधा क्या हैं। लोग राम को बतलाएंगे,यहाँ होती मर्यादा क्या हैं। अब न किसी मूरत को,यहाँ"मीरा पति बनाएगी। और हर पत्नी अपने पति की,नित्य दुर्गति बनाएगी। सब लेकर पूछेगी पत्नी,आंखिर आपने साधा क्या हैं। लोग राम को बतलाएंगे,यहाँ होती मर्यादा क्या हैं। पल्सर,पिज़ा,बर्गर ही,प्रेम का प्रतिफल निकलेगा। और ओयो में जाकर,प्रेम का अंतिम हल निकलेगा। तजुर्बे पर हावी होगी,के ब्वॉयफ्रेंड का इरादा क्या हैं। लोग राम को बतलाएंगे,यहाँ होती मर्यादा क्या हैं। यक़ीनन call फ्री होगी,लोग चैटिंग से रिश्ते ढूंढेंगे। बच्चे फूहड़ नाच करेंगे,और मां बाप खुशी से झूमेंगे। पहनावे से न पहचाने जायेंगे,के नर मादा क्या हैं। लोग राम को बतलाएंगे, यहाँ होती मर्यादा क्या हैं।

अमरूद

 घर छूटा तो आंगन छूटा,खत्म हुए वजूद हमारे आंगन के। पूरे गांव मशहूर थे साहेब,कभी अमरूद हमारे आंगन के। माना आज बिखरे हुए हैं, कोई यहां गया,कोई वहां गया; थी गांव की सरपंची न बदली,बावजूद हमारे आंगन के। क्या क्या छीना शहर ने,आज बोला"गांव का आंगन मुझसे; पंछी छज्जर छोड़ गए हैं,गाय,कुत्ते हैं बेसुध हमारे आंगन के। दरवाजे का जमघट हैं छूटा,छूट गई बगल की बूढ़ी काकी; बच्चें भी रहते है जैसे,हो खुद में"मशरूफ़ हमारे आंगन के।

पत्थर

 यूं कुछ लोग,यहां"आजमानें में लगें हैं। जैसे दिल को पत्थर,बनाने में लगें हैं। अभी जो खोल से,बाहर नहीं निकलें; वही चुजें हमें आंख,दिखानें में लगें हैं। जिनमें साया_गाह,खुशबू भी नहीं कोई; बस वही लोग औकाद बताने में लगें हैं। जहां जिंदगी हमसें,जान छुड़ाने लगी हैं; हम उसी दौड़ में,इश्क़ जताने में लगें हैं। जो बच्चें कभी कौम को समझ नहीं पाए; वही कौम के नाम पे"पत्थर उठानें में लगें हैं। ये उलझन हैं,तुझे दे भी तो"सनम क्या दें; कई चांद तो तेरे,ख़िदमत_खाने में लगें हैं।

फ़रवरी

 इश्क़ में फिर कई,इम्तिहान लेगी फ़रवरी। फ़िर से कई गुलाबों की,ज़ान लेगी फ़रवरी। इशारों में कहों,मोहब्बत इशारों का भाव हैं; दूर से ही आशिकों को,पहचान लेगी फ़रवरी। कई नन्हीं उम्र को,ये हसीन ख़्वाब देगी; कितने पुरानें उम्र का,उन्वान लेगी फ़रवरी। तुम अब तलक क्या,गुलाबों पे ही अटकें हो; हम इस तरह मिलेंगे,के उन्हें जान लेगी फ़रवरी।

बुजदिल

 जो हर मोर पर कुचला जाए, ऐसा मेरा दिल नहीं ठहरा। मगर मोहब्बत से हार भी जाए, मैं इतना बुजदिल नहीं ठहरा। हुनर खा गई मेरा,मुझी से कहती हैं; तू अब उतना,काबिल नहीं ठहरा। मुद्दत हुई उनसे,मिलकर कुछ कहें; मिलें भी,तो"वो संगदिल नहीं ठहरा। वो चेहरा क्या खूबसूरत होगा,जब" लटें नहीं ठहरी,कोई तिल नहीं ठहरा।

डिग्रियां

 बरबस न किसी के,आंखों को रूला दीजिए। प्रेम न समझ आए,तो"डिग्रियां जला दीजिए। किसी की इक उम्र लेकर,चंद लोग यूं कहते हैं; बहुत हुआ जाइए,आप हमको भुला दीजिए। भरोसा आपको करना हैं,ये जरूरत आपकी हैं; हमनें इश्क़ कर लिया,अहसान ये चुका दीजिए। खोखलें हैं जो उसूलों से,और यहां दिल से भी; शिक़ायत वही करेंगे की,इश्क़ का सिला दीजिए। इश्क़ अगर जुर्म हैं,तो"हम तैयार है जो कहिए; जान ये ले लीजिए,हमें जहर कोई चटा दीजिए।

सिर्फ़ तुम्हीं थे।

 तुम्हीं थे,हां तुम्हीं थे,सिर्फ़ तुम्हीं थे। बाकी सारे रिश्तें,सनम"मौसमी थे। किस तरह बयां करें,बस ऐसे समझो; तुम ख़ुदा थे,और सब बस आदमी थे। जहां उपज सकते थे,मरे अरमां भी; तुम चांद थे,ख़्वाब थे,खुशनुमा जमीं थे।

इश्क़

हमारा तो तीसरा हैं,क्या तुम्हारा पहला इश्क़ हैं। हो रहे हो अधीर तुम,बहुत गूढ़ मसला इश्क़ हैं। तुमको कहीं का न छोड़ेगी,फिर तेरा पता पूछेगी; समझ रहे थे नादानी जिसको,ये पगला इश्क़ हैं। बस स्टॉप से 4 कदम चलकर हैं जो चौथी गली; वहीं लड़कियों का हॉस्टल हैं,मोर अगला इश्क़ हैं। और न छूरी,न खंज़र,ना ही इसमें कोई कैद हैं; भावनाओं से खेलकर,किसी से"लेना बदला इश्क़ हैं। थे बड़े चालाक लोग,जो बस कौड़ियों में बिक गए; तुम ग़र हो नहला,तो"यहां नहलें पे दहला इश्क़ हैं।