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गुब्बार

 तुम चाहती तो,यक़ीनन प्यार हो जाता। ये छोटा खिलौना भी,गुब्बार हो जाता। वज़न वजूद का तौलने से क्या फायदा; दिल को टटोलती तो इख्तियार हो जाता। सैकड़ो लोग यहाँ,हजार बातों से क्या हैं, काश कायदे का,एक ही यार हो जाता। कीमती लोग सनम,बहुत सस्ते होते हैं, दिल को समझती तो, ऐतबार हो जाता। जिंदगी यूँ ही कटती है,कट ही जाएगी; मगर तेरा मिलना भी,एक बार हो जाता। सागर यक़ीनन अपनी,गहराइयों को छूता, तेरा इनकार उस दिन इजहार हो जाता। दुनिया मेरे शब्दों की,यहाँ तामील करती; तेरे सायें में,ये पन्ना भी अखबार हो जाता।

हुकूमत

जिसकी हुकमत,उनकी हैं अख़बार की बातें। मज़रूम किसको सुनाएगा, सरकार की बातें। सियासत से कमीशन का,फ़रमान हैं आया। दरोग़ा जी ने भी,अपना पूरा ज़ोर हैं लगाया। बकरी चोरी का गलियों में किस्सा हुआ हैं। बैंक चोरी में दरोगा जी का,हिस्सा हुआ हैं। विधायक को मिला,हैं ये चर्चे-बाजार की बातें। मज़रूम किसको सुनाएगा,सरकार की बातें।

आदमी

बेतहाशा भीड़ हैं,मग़र' कोई आदमी नहीं हैं। आसमाँ तक पहुँच तो हैं,पैरों तले जमीं नहीं हैं। अमीरों की जुबान यहाँ,हमेशा खाली रही हैं; गरीबों से ही सुना है,मुझें कोई कमी नहीं हैं। अपनी ग़ुरबत को ही,जीने का सहारा बनाते हैं; हज़ार शिकायत हैं,मग़र'आंखों में नमीं नहीं हैं। वक़्त इसी ख़्याल में गुजरा,तुम साथ तो होते; दिल मिलते जहाँ,ना पूछ'क्या हमनशीं नहीं हैं। नाज़ुक दिल से यहाँ, मतलब के रिस्ते बनाना; तुम्हीं बताओ न सनम,क्या ये गोकशी नहीं हैं। भुलाकर साथ चलनें की, अब जरूरत क्या हैं; अग़र रहा दिल में नहीं,तो फिर'तु कहीं नहीं हैं।

ऊँचाई

मुझको मेरी ऊँचाई से,वो गिरा कैसे देगा। तु दरियाँ हैं,भला समंदर को'हरा कैसे देगा। मेरे शब्दों से अक्सर,यहाँ सरकारें बदली हैं; मेरी बातों को,यूँ ही हवा में उड़ा कैसे देगा। जिसने सावन को,पतझड़ जैसा जिया हो, उसको ये मौसम,साहेब' दगा कैसे देगा। सच के सायें में,यक़ीनन परेशानियां तो हैं; फिर भी'कोई झूठा मुझें,मिटा कैसे देगा। जब भी कुचले गए,हम यहाँ और निखरें हैं; मेरी शख्शियत को भला,तु दबा कैसे देगा। निगाहें मेरी दहलीज़ के,अंदर भी देखती हैं; तीर चुपके से,कोई हमपर'चला कैसे देगा।

दोस्त

ए सूरज तेरी रोशनी में,उसको नहाना आ गया। महबूब मिला ऐसा,के ठोकरों में जमाना आ गया। इस तरह आजकल,तरक्की कर रहा हैं ईश्क़ में' पहली चरण में,हाथ लड़की का दबाना आ गया। कलतक जो दोस्त,उधारी चाय की सधाता न था, संगते-ईश्क़ में'बिल रेस्टुरेंट का चुकाना आ गया। कभी रहा नाज़ था हमकों,हमारी यारगी पे दोस्त; हाथ लड़की का थामा,तो' नज़रें चुराना आ गया। दिल हुआ छोटा साहेब,यहाँ इस कदर मेरे यार का; हज़ार रिस्ते तोड़कर,इक रिश्ता निभाना आ गया। खफ़ा जो कभी होता नहीं था,किसी बात पर मेरे; अदायें ईश्क़ में उसे,अब रूठना-मनाना आ गया।