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जरूरी था क्या

ये पूछकर,हमकों बतलाना जरूरी था क्या। तुझें न आना था,तो'आना जरूरी था क्या। जो थी उम्र की गलतियाँ,वो तो होनी ही थी; हर बात पर हमें समझाना, जरूरी था क्या। इसमें हर्ज़ ही क्या,अगर कोई दिल से ही सोंचें; दिमाग़ तेरा हर बात में लगाना,जरूरी था क्या। इक ही अदा से मिलतें,तो'हमदम अच्छा था; ज़ख्म देकर फिर सहलाना,जरूरी था क्या।

कुनबा

 अबतक संभाला था जो,मेहरबाँ बिखर गया। तुम गए ऐसे की सारा,कुनबा बिखर गया। लानत है अपने आप पर,के ये सब देखना पड़ा; घर भी बिखर गया,उनसें भी रिस्ता बिखर गया। बनाने चलें थे दीवार हम,दूसरों के छत के सायें में; अपनी गलतियों से आए-दिन,दास्ताँ बिखर गया। चेहरा तराशा ख़ूब,मग़र रूह तराशा नहीं गया; हुई उम्र तो,सबकुछ आहिस्ता-आहिस्ता बिखर गया।

ईमान

 हम बंदर हैं इस खेल के,सिर्फ वक़्त ही मदारी हैं। कोई नाच रहा हैं शौक़ से,किसी पे ज़िम्मेदारी हैं। ए हुजूम में झंडे उठानें वाले,ज़रा गौर से सुनों; मैं आज कुचला गया हुँ,तो'कल तेरी भी बारी हैं। भाई की झूठी वसीयत,अब तलक थामें हुए हो; अब क्या तुम बताओगे,यहाँ क्या मक्कारी हैं। जाकर झूठ को कह दों,अपना दम लगाकर देखें; नुकसान लाख हो,सच मे'देनी हमें हिस्सेदारी हैं। पैसा जरूरतों तक हो,हुनर की क़ीमतें समझों; अगर हो जाए ईमान पे भारी तो'इक बीमारी हैं।

मोहब्बत

अंजुरी भर मुस्कान लिए,जब' हो एक,दो निग़ाह'मोहब्बत हैं। लाचारी में भी ख़ुद से ज्यादा, करना उसकी परवाह,मोहब्बत हैं। उजालें को और उजाला देकर, ख़ुद हो जाना स्याह,मोहब्बत हैं। हो इक ही गलती,सौ बार अगर, लाख करें कोई आगाह,मोहब्बत हैं। घर की जिम्मेदारी,उठाने वाला, होने लगें ग़र बेपरवाह,मोहब्बत हैं। चुल्लू भर पानी मे रहकर,देना' यहाँ समंदर की थाह,मोहब्बत हैं।