संदेश

जड़

 हम अपने ही छत के नीचे,घरों को ढूंढते हैं। जो उजड़ चुकें है पेड़,अब जड़ो को ढूंढते हैं। मेरा तू हो जाए,यहाँ अब मुमकिन ही नहीं; खिल गए जो फूल,कहाँ पतझरों को ढूंढते हैं। एक चाँद मेरा भी,दोस्त'मुरीद था कभी; मग़र जो उठ गए हैं लोग,मक़बरों को ढूढ़तें हैं। ग़ुरूर किस बात का हैं,वक़्त सब बदल देता हैं; शीशे के शौक़ीन भी यहाँ, पथ्थरों को ढूंढते हैं। तू मुझें फिर कोई अब,नई रोशनी न दिखा; उजालें से डर है मुझें,हम अंधेरों को ढूंढते हैं।

आसानी

 शराब की तरह,पानी से नहीं मिलनेवाला। मैं तुझे अब आसानी से नहीं मिलनेवाला। कल तक मोहब्बत थी,तो"बहुत ख़ास थे तुम; मैं अब तुमसे बहुत हैरानी से नहीं मिलनेवाला।

शहर

 बगैर उसके यहां,शहर कुछ भी नहीं हैं। मगर उसको रहीं खबर कुछ भी नहीं हैं। इतनी शोखी,इतनी बेबाकी हैं उसमें; उसपे दुनिया का असर कुछ भी नहीं हैं। यूं तो शहंशाह है हम,अपनी गली के; हम लेकिन,उसके नजर कुछ भी नहीं है। आने को हो,तो"आ जाएगा सूखे पत्तों पे; इश्क़ में,चेहरा,हुनर,जिगर कुछ भी नहीं हैं। हुस्न को शब्दों में कहें,तो"बनती हैं गजल; वर्ना गज़ल में,काफिया,बहर कुछ भी नहीं हैं।

ताल्लुकात

 सनम"हम वो नहीं जो,हर ताल्लुकात पे मर जाते हैं। खैर तुम अपनी छोड़ो,हम तेरी हर बात पे मर जाते हैं। इक तुम हो,जो खुद के मुनासिब,हर शय को सजाती हो; और हमारा दिल आ जाए,तो"हम खैरात पे मर जाते हैं। उजाले की तलब हैं फिर भी"दिल को सूरज नहीं भाता; दीवानगी ये हैं,के फिर वही लोग,चांदनी रात पे मर जाते हैं। सनम गर चाहती नहीं,तो"मुझसे बहुत फासला कर लो; तुमपर इतने मर चुके है,के अब बिना बात के मर जाते हैं।

रंग

 शोहरत आया,पैसा आया,मगर उम्र ढल चुकी थी। मोहब्बत तब समझ आई,जब रंग बदल चुकी थी। और जिस शाख पे,मन्नत के धागे बांधे थे कभी मैनें; वो पेड़ गिर गया था,अब वो शाख जल चुकी थी। वो लड़की जो मेरे लिए,जान देने की बात करती थी; घर की बातों में आ गई थी,ग़ैर के साथ चल चुकी थी। इक मेरे दोस्त ही थे,फिर मिले उसी ही तरह जैसे थे; बाकी दुनिया का क्या कहूं,बिल्कुल बदल चुकी थी।

लड़कियां

 रात रात भर किसी के कॉल पे जागी लड़कियां। इश्क कहां समझी हैं,इश्क़ में भागी लड़कियां। और पिता के गुरूर को, छलनी छलनी कर दिया; चांद की तरह रहेंगी,उम्रभर"वे दागीं लड़कियां। गौना, चौथारी, परिछावन, धनबट्टी,मुंहदिखाई; इन सब से वंचित ही रहेंगी,वे अभागी लड़कियां। अक्सर ज़ाहिल की ही, चक्कर में पड़ जाती हैं; ये उम्र के पहली चढ़ान पे,हुई अनुरागी लड़कियां।

तोहफ़ा

 आप भी कोई तोहफ़ा,बेमिसाल दीजिए। उठाइए पत्थर,मेरी तरफ उछाल दीजिए। मुझको मेरी मोहब्बत, अब मिलनें से रहीं; अब किस्मत के भरोसे, ये सब टाल दीजिए। आपको मालूम कि अभी हम, तंगहाली में हैं; वीरता की बातों से, न मुझमें उबाल दीजिए। गर पहचानतें हैं तो, चाय तो पिलानी पड़ेगी; दोस्त है तो कुछ रुपए, जेब में डाल दीजिए।