भरपाई
सुना है वो अब भी ढूंढता हैं मुझे; हुई किसी से मेरी,,भरपाई नहीं हैं। ये शक्शसीयत यहां रही है मेरी; मैने जिदंगी अपनी यूं गंवाई नहीं हैं। तुम्हारी शिकस्त पे,दिलासा कौन देगा; जरूरी हैं अगर घर में भाई नहीं हैं। गैरत,मोहब्बत बहुत कुछ है देने को; सिर्फ दौलत ही तो,हमनें कमाई नहीं हैं। इतनी बात पर,किसी को छोड़ा न करे; के आदमी अच्छा है,बस ऊंचाई नहीं हैं। कुछ इस तरह हो गई है जिन्दगी शाली; दूध तो हैं,मगर"दूध में मलाई नहीं हैं।