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भरपाई

 सुना है वो अब भी ढूंढता हैं मुझे; हुई किसी से मेरी,,भरपाई नहीं हैं। ये शक्शसीयत यहां रही है मेरी; मैने जिदंगी अपनी यूं गंवाई नहीं हैं। तुम्हारी शिकस्त पे,दिलासा कौन देगा; जरूरी हैं अगर घर में भाई नहीं हैं। गैरत,मोहब्बत बहुत कुछ है देने को; सिर्फ दौलत ही तो,हमनें कमाई नहीं हैं। इतनी बात पर,किसी को छोड़ा न करे; के आदमी अच्छा है,बस ऊंचाई नहीं हैं। कुछ इस तरह हो गई है जिन्दगी शाली; दूध तो हैं,मगर"दूध में मलाई नहीं हैं।

हाल

वो जब भी दिल का,साहेब" हाल पूछता हैं। लगता है कोई केमिस्ट्री का,सवाल पूछता हैं।  दर्द सारा इतने से ही,मेरा मिट जाता हैं; जो भी पूछता है तो इतना,कमाल पूछता है। बिना उसके रहता,कुछ भी ठीक नहीं हैं। मगर बड़ी नादानी से,वो बे_मिशाल पूछता हैं। किसी रोज मिलकर,उसे सब कह देना हैं; हाल तुम्ही से है फिर क्यू साल दर साल पूछता हैं। और मोहब्बत को इतनी समझती हैं दुनिया; मसला इश्क में सिर्फ रोटी दाल पूछता हैं।

आसरा

 तू साथ होता तो,मत पूछ"मैं क्या बन जाता। मेरा दर्द ही मेरे जीने का,आसरा बन जाता। मैं नहीं जानता उसकी,रहमत में कितना दम हैं; मगर तू साथ चलता तो,यकीनन खुदा बन जाता। यू तो मेरी तकलीफ़ मुझपर,बहुत भारी गुजरी हैं; तू समा लेता गोद में तो,मैं बहुत हल्का बन जाता। छुछुंदर क्या कुचलेंगे भला,फन विषधर नागों का; सागर सूखता भी तो,साहेब"इक दरिया बन जाता।