संदेश

सितंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आसमान

मेरा महबुब चाँद है,ए ख़ुदा' तु उसे भी कोई,आसमान तो दे। जमी तेरी ये छोटी पर जाएगी तु मेरे पैरों में थोड़ी उड़ान तो दे। माना खुदा तेरी सुनता नहीं है जरा दिल से उसे,तु अजान तो दे। बेदाग़ चेहरे में,खूबसूरती कैसी, गालों पे तिल का, निशान तो दे। साँवला रंग भी अच्छा लगता हैं; चेहरे में थोड़ा,नूर इत्मिनान तो दे। ख़्वाब तेरे हक़ीक़त हो जाएंगे, ये इश्क़ है,तु पहले इम्तेहान तो दे। हज़ार कसमें मैं तोड़ दुँगा सनम तु साथ जीने की हमें जुबान तो दे। हमारें रिस्ते का कोई नाम तो हो, तु खुदा है मेरा,आकर बयान तो दे। ये सच है तुम्ही से यहाँ रोशनी हैं; यूँ न समझेगी दुनिया,पहचान तो दे। कबतक मेंरे हौसलें आजमाएगा, आकर जिंदगी में,थोड़ी चढ़ान तो दे।

हुनर

सुना है तु बहुत अच्छी नौकरी करता है; क्या यही सुनाएगा,तु बड़े शिखर पर है। जितना पाया हैं,उसी पर ग़ुरूर पाला है; समझता है,सारी मंजिले तेरे ही घर पर है। तेरी हैसियत के इतना,उड़ा कर आया हुँ; यूँ सागर थोड़े न,आया यहाँ नहर पर हैं। वो आराम से है चंद कोठिया जो बनाई है; यहाँ महल बनाकर भी,लोग सफर पर है।  हाँ बता न क्या है यहाँ पर पहचान तेरी, सिर्फ मुलाजिम है,थोड़े ही न'दहर पर है। चंद तारीफों में इस कदर उलझा हुआ है;, उनको लगता है,वही सबकि नज़र पर है। सियासत में आ गए है,शायद ख़राब लोग; तभी'हर भला आदमी,आज रहगुजर पर है। सभी नाक़ाबिल लोग,काबिज़ ओहदों पे है; सवाल जितने भी है,सब यहाँ हुनर पर है।

गुलाब

शुरुआत ये है तो,बता'शबाब क्या होगा। ए सनम तुझको,भला गुलाब क्या होगा। खुसबू लिए ख़ुद ही,खिल रही हैं हर घड़ी, भला तुझसे बेहतर,लाज़वाब क्या होगा। अपनी आँखों को पढ़ने की इजाजत दो, हम सिरफिरे है, हमें किताब क्या होगा। हम गुस्ताख़ है गुस्ताखियां तो करेंगे ही, तु चांद है,रूठकर आफताब क्या होगा। मेरी ठोकरों में रहती है यहाँ मंजिले तेरी, यहाँ शायर से कोई,कामयाब क्या होगा। लिहाज़ का पर्दा,अगर सभी आंखों में हो हमारी बच्चियों को,ये नकाब क्या होगा। अदाओ से खेलने की,नहीं है उम्र तुम्हारी, शर्बत की उम्र में,भला शराब क्या होगा। बचपन से बेहतर यहाँ,नहीं कोई दुनिया, तेरे आगे जुगनू,सूरज,महताब क्या होगा। ग़ुरूर काफी है आँखों का,जमाने के लिए, भला चेहरे में तुमको, रुबाब क्या होगा। वो उसपर मरता है,कोई बात जरूर होगी; किसी मजनूँ को, हुश्ने-हबाब क्या होगा। हज़ार दरीया जो खुद में,यहाँ समेटे हुए हैं; खुद जो समंदर है,उसे शैलाब क्या होगा। किसी के जुल्फों से,दिल खरोंचा गया हैं; ए इश्क़ हमें,अब और अज़ाब क्या होगा। हर शौक़ को,बड़े शौक़ से हैं जीया हमने, ख़्वाब जिंदगी रहीं,और ख़्वाब क्या होगा।

ज़िगर

जो हर तरह के साज़िशों से,बहुत दूर रहते हैं, जमाने की चालाकियों से,ज़िगर साफ रखते हैं। यक़ीनन शब्दों में वजन,तब जाकर आता हैं जब परवरदिगार हमपर,नज़र साफ रखते हैं। कोठे की रौनक को,कोई दहलीज़ पे न लाता हैं; ख़राब लोग भी यहाँ, अपना घर साफ रखते हैं। जहाँ खाना,वही पैखाना,ये तहज़ीब जिनकी है; वही लोग इतराते है कि,हम शहर साफ रखते हैं। माना बहुत गन्दे है,हमारे गाँव के ये गली कुँचे; मग़र जो दूर तक फैला,वो नहर साफ रखते हैं। मेरे दिल के किनारे को तुम,कभी ढूंढ न पाओगे, इश्क़ सबों से करते है,बस नज़र साफ रखते हैं। शौके जुनूँ आया है,लिखने का तो'खूब लिखिए, मग़र' जो शायर होते है,वो बहर साफ रखते हैं। मेरे हिस्से के तीर,भला किसी को चुभ न जाए जहाँ से गुजरते है,हम रहगुज़र साफ रखते हैं। मैं तो सागर हुँ मुझे,सबको साथ लेकर चलना हैं; आप दरिया है फिर क्यूँ न, बसर साफ रखते हैं। जब भी दिल से लिखता हुँ,गजल बन ही जाती हैं, अपनी जुबाँ को,दोस्त' इस क़दर साफ रखते हैं।

अख़बार

तेरी राहों में बिछ जाऊं,तु जो कह दे तो' तेरी राह में खुद को,यहाँ जाँनिशार कर देंगे। वो हमसें शब्दों में यूँ,अब समेटा न जाएगा; जब लिखेंगे उसको,तो'हम अखबार कर देंगे। अपनी लटों को यूँ चेहरे पर,गिराया न कर, ये झूलती लटें,मोहल्लें को बीमार कर देंगे। माना तेरे चेहरे में,सनम' रुबाब बहुत है,मग़र' हम पैरों की जमीं को भी,गुलजार कर देंगे। पैसा नही है क्योंकि,कहीं का नौकर नहीं रहा, जहाँ काम आएंगे सिक्के,क्या दीनार कर लेंगे। सजाया हुस्न मुझें,सनम अच्छा नहीं लगता, हम सुर्ख ओठो मे भी,सनम निखार कर देंगे। मैं आकर सनम दिल से,कभी लौटता नहीं हुँ; अब जहाँ मिलेंगे वही,अपना घर-बार कर लेंगे। तु क्या है भला क्या ये तेरे मुंसिफ़ समझेंगे; चाँद कटता रहेगा और,वो बस दीदार कर लेंगे। ना जाने जमाने की,नजरों को क्या हुआ है हर डूबने वाला कहता है दरिया पार कर लेंगे। चाँद, ख्वाब,उम्र,बच्चे भला नसियत मानेंगे जो अच्छा लगेगा उसी से वो प्यार कर लेंगे। नज़रों से बचने की सनम,तरकीब निकालो; लोग आंखों से ही हुश्न का,बाजार कर लेंगे। मेरी शिकायत को, अपनी तौहीन न समझ; हम न बोलेंगे तो लोग,त...

खिलौना

अब किसी भी बात पे मुझे,रोना नहीं आता।  दिल से बेहतर बाज़ार में खिलौना नहीं आता।  माना तु खरीद सकता हैं,हर आराम की चीजें,  जो आँखो को नींद दे, वो बिछौना नहीं आता।  तंहाई क्या है किसी, नई दुल्हन से जाकर पूछ,  जब संदेश खूब आते है,मगर गौना नहीं आता।  आज सब है उनके पास,लम्बी गारी,ऊँचे दखीचें,  निगाहें राह तकती है,क्यूँ वो बौना नहीं आता।   अपने महबूब के नखरें से,भला पड़ेसान रहता है,  इश्क़ कैसे करता है,जब तुझे सहना नहीं आता। चिड़ियों को जाल से,खेलने का हुनर हैं आ गया, चिरिमार् पड़ेसां है,जाल मे कोइ मैना नहीं आता।  चेहरे की रौनक पर,यहाँ मचलना भी वाज़िब हैं; दिल को देखने का,भला कोइ आईना नहीं आता। इस्क करता हूँ मगर' मैं,जुल्फों का गुलाम नहीं हूँ मुझे किसी के बहाव में,भला बहना नहीं आता।  वफ़ा किया उनको' यहाँ रही तब भी शिकायत हैं; क्यूँ हाथ मिलाकर,मुझको छोड़ना नहीं आता।  ऐ सागर इस जमाने की,दुश्वारियों को समझाकर; मसलते है वही जिन्हें,ठीक से तोरना नहीं आता। मैं जो भी लिखता ...