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सहारे

 बस तेरी ही उम्मीद के,सहारे काम आयेंगे। जब घर बटनें को होगा,तो'दरारें काम आयेंगे। लहर के संग चलिए,गहराई में ख़ूब उतरिए; सफर जब खत्म होगा,तो'किनारें काम आयेंगे। तुम्हारे सींचे हुए पौधें ही,तुम्हारे गमले तोड़ेंगे; इस गफ़लत से निकलिए,बच्चें तुम्हारे काम आयेंगे। पड़ निकलतें परिंदे सारे,घोसलों से उड़ जायेंगे; मरम्मत कीजिए अपने ही,दरख़्त दीवारें काम आयेंगे। तू रखवार है यहाँ का,खुद को मालिक न समझा कर; वो कहीं के ना रहेंगे,समझतें हैं हमारें काम आयेंगे।

रास्ता

 महंगा नहीं हम,कोई राह सस्ता निकाल लेंगे। तू बेफिक्र रह,हम मिलनें को रस्ता निकाल लेंगे। माना'रहा चिठ्ठियों का दौर,अब नहीं हैं ज़ानिब; हम क़िताब बेचकर,मोबाइल का खर्चा निकाल लेंगे। ये जुनूनी आशिक़,ख़ुद भलें ही फेल हो जाए; मग़र महबूब के लिए,एग्जाम का पर्चा निकाल लेंगे। पिता के ख़्वाईश पर,जो'रिजल्ट निकाल नहीं पाए; महबूब की बात पर,कलेजा,गुर्दा निकाल लेंगे। और हमारें बुज़ुर्ग, मोहब्बत पे भलें नाराज़ होंगे खूब; दिखेगी लड़की,तो'साफ़ करने को चश्मा निकाल लेंगे। नए जमानें के आशिक़ों की,रफ़्तार इतनी हैं; मिलेंगे आज और कल लड़की से रिस्ता निकाल लेंगे। अब तुम्हीं बताओं,और किस तरह सँवरना हैं मुझें; हम कैसे पकी दाढ़ियां,चेहरें की झुर्रियां निकाल लेंगे।

मन

 बिना दिल में उतरें,कुछ भी'अर्पण नहीं होता। दिखा दें झूठ को सच,वो कतई दर्पण नहीं होता। लेकर गोद में कोई,प्यार से'बालों में उंगलीयाँ फेरें; भले कह न पाए,मग़र'ये किसका मन नहीं होता। तुम मेरे दर्द को समझों,हम भी तेरे दर्द को समझें; ईश्क़ ये भी है,सिर्फ़ मिलने से,प्रेम पावन नहीं होता। बस पूछना इतना था,मोहब्बत के तंग तहजीबों से; हो ब्यथित हृदय,तो'अश्रुजल से आचमन नहीं होता। जो विरह की वेदना में,हो बहुत तल्लीन बैठें है; सिर्फ़ मौसम बदलने से,उनका सावन नहीं होता। भलें हो खिलखिलाती धूप,या बरसात का मौसम; बग़ैर उनके जी नहीं लगता,अच्छा मन नहीं होता।

बचना

 चाँदनी रात हो,और चाँद के ही दीदार से बचना। वो बच रहें थे बहुत प्यार से,मेरे प्यार से बचना। ऐ हवा हौसला है,तो'जाकर घर जला अमीरों का; तकलीफ़ न आए,हिदायत है मेरे यार से बचना। इरादा बदला हैं,अभी कमज़ोर नहीं हुए हैं हम; क़यामत होगी लड़ गए,तो'मेरी तक़रार से बचना। भरोसा करके,तुमपर'कोई ख़ुद को निढाल दें,तो' ग़र साथ दें न सकों,तो'खबरें-इश्तेहार से बचना। परखना कोई यहाँ,दोस्त'मेरे महबूब से सीखें; क़ीमतें भी चाहती हैं,कहती है बाज़ार से बचना। तेरे ताल्लुक़ के बाद,मेरा कोई ताल्लुक़ नहीं बचेगा; इस तरह हमें चाहना,के हर दर्रे-दीवार से बचना।

आराम

 इतना सब्र,इतना एहतेराम कहाँ से लाता हैं। तू अपनें दिल को,आराम कहाँ से लाता हैं। ऐ ईश्क़ मैं अब भी,बहुत हैरान हुँ तुमपर; रोज लुटता है,नया मुकाम कहाँ से लाता हैं। सख़्त,पर्देदार,उसुलपरस्त,यहाँ सब लूटें हैं; इतना हौसला,सुबहों-शाम कहाँ से लाता हैं। वो बीमार है,तो'घुटन हमें भी महसूस होती हैं; ग़ैर की क़ुरबत में,इतना पयाम कहाँ से लाता हैं। जिसें यहाँ ज़र्दे से भी,बहुत परहेज़ था कभी; बता'तू उनके हाथों में,जाम कहाँ से लाता हैं।

शिकायत

 मेरे खुले जख़्मों को देख,आदतन बांधता तो हैं। वो मेरी शिकायत करता हैं,चलों जानता तो हैं। मोहब्बत अब भी हो सकती है,ग़र ख़ुदा चाहें; मैं ख़ुदा के भरोसें हुँ,वो ख़ुदा को मानता तो हैं। मना करने से पहलें, उसनें मेरा नाम पूछा था; चलो जो कल दिल मे उतरा था,पहचानता तो हैं। वो मुझकों देख अक्सर,यहाँ बचकर निकलती हैं; ईश्क़ है तभी,खुद को'इतना,जो संभालता तो हैं। अग़र तुम साहेब हो गए,तो'पापा मान भी सकतें हैं; रोज नए सपनें दिखाकर मेरा ईश्क़,टालता तो हैं।