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तौबा

अपनी जिंदगी की राह में आए, हर इक दरख्तों-दीवार से तौबा। कर लिया है अब हमने भी,सनम' अब इस खुदगर्ज़ी के,प्यार से तौबा। सब हुआ अपने बीच,उन दिनों में; बस सिर्फ तुझे था,इजहार से तौबा। कहने को हर कोई,उन्हें चाँद लगें हैं; बस घर के चाँद के,दीदार से तौबा। यहाँ मौसम ही,जब क़ातिल निकले; फिर क्या फूल से,क्या खार से तौबा। ग़नीमत हैं,चुनाव वो जीत गए;वर्ना' कलतक था,उसी सरकार से तौबा। कोई तुमसे यहाँ,बात बनाना सीखें; महबूब भी हैं,है मेरे सरोकार से तौबा।

मेहरबानी

उनकी आँख में आया इतना पानी न होता। दिल का रिश्ता हुआ,अग़र जिश्मानी न होता। मैं सच में'किसी फुटपाथ पे,तुझे खड़ा मिलता; मेरा दुश्मन मुझे मिला,अगर खानदानी न होता। समंदर से पूछ बैठा कोई,तु इतना खारा क्यूँ हैं, मैं मीठा होता,तो मेरी लहरों में रवानी न होता। दर्द-ए-इश्क़ हम तेरा,सबकुछ सह लेते सनम; बात मैं अपनी सुना,औरों के जुबानी न होता। कामयाबियो की इबादत,सिर्फ़'लिखी जाती तो दिल की राह में आज इतना, कहानी न होता। तु पैगम्बर,चाहें ख़ुदा,चाहें मिशाल बन जाती मग़र; अधूरी तब भी रहती,कोई दिलवरजानी न होता। मुफ़लशी के दौड़ में ही,सच्चा इश्क़ पनपता हैं; गरीबों का इश्क़'इश्क़ रहता है,मेहरबानी न होता।

निग़ाह

मैं कैसे मानू,तेरी महफ़िल में' मेरी बात चलती नहीं हैं। अब हम वहाँ नहीं जाते,निगाह जहाँ संभलती नहीं हैं। भाव चेहरें के ही,यहाँ सबकुछ बयाँ कर देते हैं,सनम' अदा ख़ूब बदलती है,मग़र रंग तु अभी बदलती नहीं हैं। दिल ने अब ये मान लिया हैं, तु अब हो गई है बाज़ारू; तु महबुब हज़ार बदल,ये बात मुझे अब खलती नहीं हैं।

ठिकाना

अब तुम बुरा मानो या भला,मग़र' मैंने बदल दिया,अपना ठिकाना हैं। लड़ाई से मुझे कतई गुरेज़ नहीं,मग़र' शागिर्दों की बस्ती में नहीं जाना हैं। भले उड़ने का हुनर,हमें मालूम न हो, जब भी हो,चट्टानों से ही टकराना है। अब इन हाथों से,कभी खंज़र न उठेंगे; उनके नाम की मेहंदी जो लगाना हैं। मोहब्बत है,तुझे अग़र दीवानगी भी है; तो'भला किस बात का आजमाना हैं। अब उनकी ही राह में बिछना है,मुझे' जिस राह से होकर,सनम को जाना है। इस राह में पैर के,तु नासूर न देखा कर; ये इश्क़ है,तुझे खंज़र से भी पार पाना हैं।

जवानी

यहाँ मासूम बचपन की,दहलीज़ पर, अपनी मिसालें-जवानी छोड़ आए हैं। हमनें जब भी चाहा हैं किसी को,जरूर' कोइ चाहत की निशानी छोड़ आए हैं। ये चाँद,सूरज से हमें क्या लेना,हम तो' गावँ में फिज़ा,आसमानी छोड़ आए हैं। हमें काम का हवाला देने वालो,हम तो' तेरे मुन्नों के वास्ते नई कहानी छोड़ आए। दरीया की दोस्ती पे ग़ुरूर पाले हो,हम' आंखों में'समंदर इतना पानी छोड़ आए हैं। जितनी फिज़ा में यहाँ,रंगनियत नहीं है, हम उतनी अदाओं में,रवानी छोड़ आए हैं। जो मेरे दिल से खेलते रहें,इश्क़ ऐसे किया; उनकी दहलीज़ पर,जिंदगानी छोड़ आए हैं। जबतक रहें साथ,पाँव जमीं रखने न दिए; मलाल उसे है,क्यूँ मेहरबांनी छोड़ आए हैं। इक फूल पर भला तु, जाँनिसार हो गया, हम अपनी राह में,बाग़वानी छोड़ आए हैं। अब मेरी बातों की,दुनीया तामील करती हैं, इशारो की हरकतें,बचकानी छोड़ आए हैं। लहरों से खेलने की,नहीं है अब उम्र हमारी, पटाखों की उम्र में,ये नादानी छोड़ आए हैं। वही मुझें आजमाँ रहा हैै यहाँ,जिसके ख़ातिर' हम अपनी विरासत,मेज़बानी छोड़ आए हैं। नजरों के गुरुर से अब,भला हमें क्या लेना, अब हम हर नफ़ासत,निगेहबानी ...