संदेश

मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शेर

नदी लड़कर जब किसी तुफान से निकलें। शेर बड़ा वो है,जो गमों के उफ़ान से निकलें। महबुब की बातों पे भला,यूँ खुश क्या होना; जो भी उजरें हैं,मोहब्बत की दुकान से निकलें। चंद दोस्त हमनें,किसी उम्र में बनाए थे कभी; कुछ आस्तीन मेरे भी,यहाँ मकान से निकलें। जब मिलूँ तुमसें,बस इतनी ख़्वाईश रखता हुँ; तु सर झुकाकर और हम,बड़ी शान से निकलें। हमनें बीबी से सहेली का,नंबर क्या माँगा; वो ऐसे बरसें,जैसे खतरें के निशान से निकलें आदमी वो है,जो रोतें हुए को हँसा दें साहेब; क्या मतलब,आप किस खानदान से निकलें। भाई तब यहाँ भाई, यक़ीनन रह नहीं जाता; हाथ उसके आपकी,अगर गिरेबान से निकलें। ज़मीं के लोग ही,जमानें की किस्मत बदलतें हैं; हौसलें थोड़े न है यहाँ, आसमान से निकलें।

पहचान

 इतना बदला की,पहचान में नहीं आता। जो पूरा है कभी,अभिमान में नहीं आता। जो कहता था बनें है,हम इक-दुजें के लिए; दोस्त वही मिलनें,मेरे दालान में नहीं आता। यूँ तो घर में क्यारियाँ,सजा रखी हैं हमनें; अब फूल कोई भी,फूलदान में नहीं आता। बच्चे की फी,बीबी की साड़ी का ख्याल हैं; बस माँ की दवाई का,ध्यान में नहीं आता। किताबों का समंदर लांघकर,साहेब हुए हैं; मग़र जिंदगी क्या है,इम्तेहान में नहीं आता। बुजर्गो का हाल पूछा करों,और क्या दोगें; जो खुद बरगद हैं,सायबान में नहीं आता। पथ्थर की चोट, जमाने को नज़र आती हैं; कोई फूल से खरोंचे,निशान में नहीं आता।

शहर

 अभी तो आया हुँ यहाँ,ये रहगुज़र छोड़ दूँगा मैं। इरादों से थक जाऊँगा,तो'तेरा शहर छोड़ दूँगा मैं। ये विरासत रही है मेरी,मैं गुमनाम हो नहीं सकता; तेरे नकारने से पहलें,अपनी ख़बर छोड़ दूँगा मैं। आजाद शायर से पिता,नौकरी की उम्मीद करते हैं; मुझको अगर न समझें,तो'अबकी घर छोड़ दूँगा मैं। यूँ तो मेरी गजलों की यहाँ,हो गयी दुनियाँ मुरीद हैं; मग़र तुझें जब लिखना चाहुँगा,बहर छोड़ दूँगा मैं। मेरे हालात जो भी हो,तुम मुझकों आवाज़ तो'देना; किसी भी ऊँचाई पे रहूँगा,तो'वो दहर छोड़ दूँगा मैं। अभी तो आई हो,संग मेरे कुछ वक्त गुज़ारों भला; सुबह गुजर भी जाएगी,तो'तुझें दोपहर छोड़ दूंगा मैं।

आभारी

 दिल मेरा, उसका आभारी भी हैं। और उसी से,दिल की बीमारी भी हैं। उम्रभर बुजुर्गों की,जो मनाही रही है; हमें उसी राह,जाने की तैयारी भी हैं। अभी प्यार ठीक से,हुआ भी नहीं हैं; दिन मुश्किल हुआ,रात भारी भी हैं। किस्मत वही जाकर,बदलनी भी हैं; जहाँ किस्मत के,बैठें शिकारी भी हैं। हमारी सादगी का,ये आलम रहा हैं; दुश्मनों से करते रहें,रायशुमारी भी हैं। उसपर प्यार आना भी,मुनासिब हैं; लड़की सुंदर भी हैं,और कुँवारी भी हैं।

शायरी

 नादान परिंदों को भी,अब रायशुमारी आ गयी। मैं उसको लिखता रहा,मुझको शायरी आ गयी। मैं कितना अंजान हुँ उससे,मालूम चला तब; जब मेरे हाथ मे उसकी,लिखी डायरी आ गयी। दिल की बात जब भी,हमनें बताना चाहा उसे; बीच में'उसकी ख्वाइशें,मेरी लाचारी आ गयी। मिलने का सलूक यूँ भी,जमाने को मालूम न था; ये कैसी हवा चली,दूर रहने की बीमारी आ गयी। जरूरतों के साथ,अब यहाँ इतने ढ़ल गए है वो; मौकापरस्ती करनी उसे झूठी तरफ़दारी आ गयी।

जिम्मेदारी

 तुम क्या जानोंगे,दुश्वारियों तक आ जाना। उम्र से पहले,जिम्मेदारियों तक आ जाना। हाथ खाली हो,घर के चूल्हें उदास पड़ें हो; बेटी का पिता की,दाढ़ीयों तक आ जाना। हज़ार मन्नतों के बाद,कमाई गिरवी रखकर; बेटी सौंप,घर की किवारियों तक आ जाना। कलेज़ा निकाल कर,ग़ैर की चौखट रखा हैं; आसाँ नहीं,सलवार का साड़ियों तक आ जाना। घर की रौनक,जो पिता का गुमान थी कभी; खबर उसकी,अपनी जबारीयों तक आ जाना।

निभाना

बड़े तीरंदाज निकलें,मेरे मोहल्लें के लड़के; लेकर शोहबत में,सभी को आजमाया गया। भला कैसे बनातें है यहाँ लोग,हज़ार रिसतें; हमसें इक ईश्क़,सलीके से न निभाया गया। शामिल सभी थे,ईश्क़ की मुखबिरी में साहेब; पहेली दिल की,किसी से न सुलझाया गया। खबर तो सबकों हुई,मेरा आशियाँ जलनें की; वक़्त रहतें दिल की आग को,न बुझाया गया। मेरे घर,मेरे खेत,जिसके चक्कर में गिरवी पड़ें; हमें उनके बच्चों से ही,हैं मामा बुलवाया गया।

हार

 इससे पहले की, मैं तुझसें हार जाऊँगा। तेरे आँखों में,इक समंदर उतार जाऊँगा। ऐ मेरे दोस्तों,मुझकों जरा ख़ूब सजाओ; उनकी महफ़िल में,होकर तैयार जाऊँगा। इक अदद आदतें हैं मेरी,जो बदलेगी नहीं, तेरी गली से निकलूँगा,तुझें पुकार जाऊँगा। कहीं शहनाई गूजेंगी,कहीं मातम पसरेगा; बस तुम खुश रहों,मैं सब स्वीकार जाऊंगा।

नज़र

 हर बेज़ार मौसम,शोख़ नज़र बन जाता हैं। जो उससे मिलता हैं,वो खबर बन जाता हैं। हम जब तेरे ख्यालों से,निकलना चाहते हैं; नज़र पड़ती हैं,ख्यालों का शहर बन जाता हैं। ताल्लुक भाँपकर,मिलते हो जहाँ के लोग; यक़ीनन ईश्क़ का,वहाँ भी असर बन जाता हैं। जज़्बात निकालिए,कोई अगर दिल में हो; एक अदद उम्र के बाद,ये ज़हर बन जाता हैं। गला काटना,हराम का भी करना पड़ता हैं; कौन कहता हैं साहेब'यूँ ही घर बन जाता हैं। दिल की राह में,यूँ अपनी शेख़ी न बघारिये;, ये ईश्क़ है,इसमें बाज़ भी कबूतर बन जाता हैं।

रिस्ता

ताल्लुक़ दिल से,मैं तुमसें बाबस्ता रखूँगा। जिंदा रहूँगा,तभी तो'कोई रिस्ता रखूँगा। अभी दौड़ मिलने का नहीं हैं,ए मेरे हमदम; मैं ख़ुद सफर में हुँ,बता'तुझें कहाँ रखूँगा। जो बात मुनासिब नहीं,वो भी कहीं जाएगी; इल्ज़ाम खुद पर मैं कितने,मेहरबाँ रखूँगा। फ़र्क़ इतना हैं उसकी,और मेरी मोहब्बत में; वो बनाएगा महबूब, बनाकर ख़ुदा रखूँगा। तुम गफ़लत में न रहना,मेरी तहजीब ऐसी हैं; जबतक जिंदा हुँ,तुझें खुद में  जिंदा रखूँगा।

आँसू

यूँ तेरा दर्द,आँखों से निकल जाता हैं। ये तो आँसू हैं,जो दिल सम्भल जाता हैं। अब तो हमें,ये ख़याल भी नहीं रहता; कौन रहता हैं यहाँ,कौन निकल जाता हैं। यूँ तेरे बदलनें से तकलीफ़ तो होगी; मग़र जिसे बदलना है,वो बदल जाता हैं। आज भी'इत्तेफ़ाकन, हमदोनो मिलतें हैं; ख़्वाब जितने हैं,सब मचल जाता हैं। बाज़ार रिस्तो का,लाख सजा लो लेकिन; सिर्फ साथ रहने से,न दिल बहल जाता हैं। ईश्क़ में ख़ुदा,इतने हौसले दे देता हैं; पथ्थर की राह में,होकर कमल जाता हैं। दिल की साहेब,मजबूरी भी तो देखिए; ख़्याल करता है उसकी,जो छल जाता हैं।

बेशऊर

हर इक नादानीयाँ,कोई ख़ता नहीं होती। बेशऊर होती हैं लड़कियाँ,बेवफा नहीं होती। हर छोटी बात पर,ये सीने से लिपट जाती हैं; फूल को रौंदे ऐसी कभी,तितलियाँ नहीं होती। अल्लर उम्र में अक्सर,गलतियाँ हो ही जाती हैं; जिन चिड़ियों को,घोसलें का पता नहीं होती। हर अहसास को खुद में,ताउम्र समेटें रखती हैं, दो हजार ग़म,इनके दर्द की इंतहा नहीं होती। चंद मीठी बातों से ही अक्सर,ये बहल जाती हैं; इनके बग़ैर,गुलजार' कोई बागबाँ नहीं होती। बावफ़ा दिल अगर आ भी जाए,तो'कौन सुनेगा; क़ैद परिंदों की साहेब' कोई इल्तज़ा नहीं होती। पहले दिल को समझिए,तब दिल में उतरीएगा; राह जो दिखती हैं आसाँ,वो आसाँ नहीं होती।

ईश्क़

मेरे हर दर्द पे,मुझसें‘जिरह करें। ईश्क़ करें कोई,तो‘इस तरह करें। रात तन्हाई में,जो रूठ भी जाए, शिकवा जगाकर,हर सुबह करें। भलें प्यार जताना,मालूम न हो ; झगड़ें-गिलें मुझसें,हर जगह करें। मेरा चुप रहना भी,सालता हो उसे, अगर बोलूँ,तो‘ डाँटा,बेवजह करें।

तुफान

ये आया यहाँ कोई,तुफ़ान सा लगता हैं।  शहर में हर कोई,परेशान सा लगता हैं। जिंदगी ख़ुद अपना, मातम मना रहीं हैं;  ये डर नया है, घर श्मशान सा लगता हैं।   हम तो शायर है, हर बात को लिखतें है;  मौत भी महफ़िल में,हैरान सा लगता हैं। देखिए ज़रा उनको यहाँ,बारीक नज़रों से; हर बच्चा कल का,निगेहबान सा लगता हैं। यहाँ क्या हमारा है, यहाँ क्या तुम्हारा हैं;  फैसला हो जाए,तो'आसान सा लगता हैं। ईश्क़ की फसल को,इसी मौसम काटेगा; आशिक़ नहीं,बेबस किसान सा लगता हैं।

बेजुबाँ

 ना कोइ दुआ लगी,न कोइ दवा लगीं। जिसको भी मोहब्बत की,हवा लगीं। दिखा कुछ भी नहीं था,आईने में उसे; चोट दिल में न पूछ,कहाँ कहाँ लगीं। पहली नज़र में तो,जो बावली सी थी; दूसरी नज़र में वही,उसे दिलरुबा लगीं। बात आँखों से हुई,लब खामोश ही रहें; बहुत बोल गई,जो सबको बेजुबाँ लगीं। इन आँखों पे ईश्क़,छाया था इस कदर; हर बार मिलकर,वो पहली मर्तबा लगीं।

कलन्दर

 कुछ इस तरह,मोहब्बत के मंजर रहें। प्यास बुझ न सकीं, पास समंदर रहें। हाल दिल का तुझें क्या,बताते सनम; तुम जितनें बाहर रहें, उतने अंदर रहें। ये ख़्याल था,प्यार मुझें हो न सकेगा; दिल के मामलें में हम भी,कलन्दर रहें। दौड़ चाहतों का जल्दी,गुजर ही गया, फूल था जिन हाथों में,अब खंजर रहें। खिल गए फूल,सारे यहाँ कुचलें गए, बच गए वही जो,कोपलों के अंदर रहें। दर-दर की ठोकरें,वो खा रहा है यहाँ; जो अपनी सियासत के,सिकन्दर रहें।

तलाश

 किसी सुकूँ की तलाश में हैं,बदहवास पड़ा हैं। तेरे इंतजार में मेरा शहर,आज भी'उदास पड़ा हैं। हैं उम्मीद उसको भी,तुम आओगी इक दिन; जहाँ तेरी बचपन का हर इक,एहसास पड़ा हैं। तेरे शौहर तुझें चाहेंगे,मग़र मुरीद नहीं रहें होंगे; यहाँ तेरी एक झलक को,हर आमों-ख़ास पड़ा हैं। तेरी राह तकतें थे,ये हाल उन लड़कों का हुआ; बस स्टैंड खाली है,पॉकेट में बस का पास पड़ा हैं। तेरे न आने से फूलों का,बहुत नुकसान हुआ हैं; रोज खिलती है,आशिकों का अवकाश पड़ा हैं। हाल हम अपना क्या तुझको,अब बताए सनम, सागर होकर भी मुझकों,लहरों का तलाश पड़ा हैं।

मतलब

 मतलब नहीं है कोई,मतलब निकाल लेंगे। निष्ठुर हैं यहाँ के लोग,क़ीमत निकाल लेंगे। तुमसें अपने रिश्तें का,हज़ार वास्ता देकर; देखना इक दिन,तेरी नेमत निकाल लेंगे। इरादा भाँपकर यहाँ,अब किसी से मिलना; जो हैं शरीफों में,वो शराफ़त निकाल लेंगे। ये सियासी लोग हैं,इन्हें सब आता है हुनर; हर हाल में,झूठ बोलने की हिम्मत निकाल लेंगे। कौन जी रहा हैं यहाँ,कौन मर रहा है यहाँ; मौका देख कुछ लोग,सियासत निकाल लेंगे। अभी साँस बाक़ी हो,तो'इतना तो बताओ; क्या हम पैसे से ही,हर जरूरत निकाल लेंगे।