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नजर

 वो ईश्क से इक नज़र कर देगी। अच्छे अच्छों को,दर-बदर कर देगी। अपनी ऊंचाईयों पे,गुरुर है तुमको; वो बस छूकर ही,तुम्हें नहर कर देगी। मैं उससे शाम को मिलता ही नहीं हूं; इतना दिल लगाएगी,दोपहर कर देगी। उसकी पनाह में जीने का मौका तो मिलें; वो फुटपाथ को भी,आलीशान घर कर देगी। गांव के जिस मोड़ से,वो रोज गुजरेगी; मेरा दावा है उसको भी,शहर कर देगी। ये है मेरे महबूब की, रहनुमाई का आलम; जिस तरफ से गुजरेगी,रहगुजर कर देगी।

मकान

 पिता की दौलत, अपना गुरुर सम्मान दे दें। तू चाहता क्या हैं,दिल के बदले हम जान दे दें। जो लड़की कहती थी,रह लूंगी छोटी खोली में; कोर्ट में कह रही थी,शहर वाला मकान दे दें। कब तलक चुकाऊंगा मैं,यहां कर्ज मोहब्बत का; वकालतें डायवोर्स दे,या पति का भी लगान दे दें। अभी महिनें चार गुजरें,और घुटने पर आ गई हैं; जो रोज कहती थी,जाकर उसे मेरा फरमान दे दें। रिस्तेंदार खूब होते हैं,एकदम से कुत्ते के माफिक; चाहतें है रिश्तेदार उजड़े तो,हाथों में गिरेबान दे दें। अक्सर वही दे देते है मशवरा,जो बेकार बैठे हैं; कीमती लोगों को कहां फुर्सत,किसी को ज्ञान दे दें। होता हर घर में एक निकम्मा,सबकी कमाई खानावाला; वही चाहता है घरवालें उसे,तमगा-ए-हिंदुस्तान दे दें।

यादें

 अपने दर्द को,यहां बातों से छलना होगा। इस तरह तेरी यादों से,मुझे निकलना होगा। आदतें,हसरतें,जरूरते,सब छोड़ दिए हैं मैंने; तुम्हीं बताओ मुझें,और कितना बदलना होगा। बहुत दूर निकल आए हैं,तुझें मंजिल मानकर; अब लौटना,खाली हाथ घर को चलना होगा। इतने जरूरी हो तुम मेरे लिए,तुम्हें अब खोना" किसी उगते सूरज का,बेवक्त सा ढलना होगा। एक इंतजार,इक सबब,तुम थी जीने का मक़सद; तेरे बाद अब कहां,फोन की घंटियों पे उछलना होगा।