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हिम्मत

 ये सच हैं, अब उतनी मोहब्बत नहीं रहीं। मग़र'तेरे बग़ैर जीने की,आदत नहीं रहीं। तुम्हीं मनाओं,भला यह प्यार का मौसम; मेरे दिल को अब इतनी,फुर्सत नहीं रहीं। कहाँ जायेंगे,ये जज्बातों का शहर लेकर; तुम नहीं रहें,तो'इसकी जरूरत नहीं रहीं। अब अच्छा लगता हैं मुझें,बेज़ार मौसम; जबसे सादगी की मुझें,शोहबत नहीं रहीं। यूँ तो रोक सकता हुँ मैं,यहाँ तुफ़ाँ का रस्ता; राह तेरी रोकूँ,मुझें इतनी हिम्मत नहीं रहीं। हैं प्यार कितना ज़माने को,समझ आया;  दौलत नहीं रहीं,तो'कोई इज्जत नहीं रहीं।

काम

 उम्र रहते सभी को,ये मुक़ाम क्यूँ नहीं मिलता। एक ही उम्र में,मोहब्बत और काम क्यूँ नहीं मिलता। साथ सोकर भी,उसके दिल को सुकूँ नहीं आया; मैं परेशान हुँ,अब उनका सलाम क्यूँ नहीं मिलता। अगर तुमको देना ही सबको,ईश्क़ का ज़ख्म ख़ुदा; तू ही बता न इसका,यहाँ बाम क्यूँ नहीं मिलता। आज घिरा रहता हुँ मैं,जमाने के रंगीनीयत के बीच; मग़र वो तेरे दामन का सुकूँ,आराम क्यूँ नहीं मिलता। चार पैसें कमाकर भी,फिर'वही ईश्क़ ही करना हैं; पढ़ाई के साथ इसका भी,इन्तज़ाम क्यूँ नहीं मिलता।

इंतहा

इस जमाने मे,मेरे दोस्त'इंतहा कुछ भी नहीं हैं। जिंदगी चंद ताल्लुक के सिवा कुछ भी नहीं हैं। जरूरी हो कोई बात तो'सभी की रखी जाए; मग़र यहाँ गैरजरूरी फलसफ़ा,कुछ भी नहीं हैं। हक़ीककत अभी ज़माने की,तुमनें देखी कहाँ हैं; यक़ीनन हुआ जिंदगी से सामना,कुछ भी नहीं हैं। पैर के धूल भी बनते हैं,इक रोज माथे के चन्दन; होता वक़्त की जादूगरी से बड़ा, कुछ भी नहीं हैं। तुम्हारा तुम देखों,हमारा हम देखेंगे'हर रिस्ता बाद में हैं कहता'तुमनें किया,कुछ भी नहीं हैं। दोस्त,ईश्क़,हार,ब्यापार,कोई हुनर बाकी रहा; यकीं मानों अभी तुमनें जिया,कुछ भी नहीं हैं। हस्र हैं आज ख़ुदा,यहीं देख यहाँ तेरे बंदे का; मिल जाए अगर महबूब,तो'ख़ुदा कुछ भी नहीं हैं। ये तो फ़र्ज़ था हमारा,जो हम उम्रभर निभातें रहें; वर्ना'रहा कभी तुमसें,मुझें आसरा कुछ भी नहीं हैं।

वहम

 उम्रभर मुझकों यही इक वहम,ढूँढता रहा। ख़ुद दुखों में रहा,दूसरों का गम ढूँढता रहा। किया था इस कदर,हमपर' सितम किसी ने; आदत सी लग गई हैं, मैं सितम ढूँढता रहा। शायरी मेरी उस दिन,जरूर मुकम्मल हो जाती उसके दिल मे भी उतरें,वहीं बज़्म ढूँढता रहा। शिकवा रहा उम्रभर,उनको संगदिल सनम से ; संगदिल भी मिलें,मैं बस इक सनम ढूँढता रहा। मोहब्बत कर रहें हैं लोग,यक़ीनन फिराक़ में; वो मेरे जैसा नहीं हैं,ज़माना हरदम ढूँढता रहा। किसी के हिसाब से ढ़लना,भला तुम क्या जानों; मैं उसकी बहाव में रही,जो जम-जम ढूँढता रहा। कलेजा निकाल कर रख देतें,सिर्फ'कह देने पर; वही मौत कैसी दें,मुझें रोज बेरहम ढूँढता रहा।

नहीं जा सकता

 मैं अग़र खाली भी हुँ, तो' तुझसें भड़ा नहीं जा सकता। वो महबूब हैं मेरा,सामने उसके अधमरा नहीं जा सकता। ऐसे हालात में हैं की ये दुआ हैं,तु मुझें हरगिज़ ना मिलें; गिर भी नहीं सकता,होकर खड़ा भी नहीं जा सकता। उसकी चौखट पर सजती हैं,रहनुमाओं की महफ़िल; हिदायत दी गई हैं,वहाँ कोई मशख़रा नहीं जा सकता। ईश्क़ वो समंदर हैं जहाँ महबूब की आसुएँ भी मोती हैं; चंद अहसासों से,दलीलों से,इसको भरा नहीं जा सकता। इस उम्र से पहले,दोस्त'हमनें इक उम्र और भी गवाँई हैं; तज़ुर्बा लाख हो लेकिन,ईश्क़ को पढ़ा नहीं जा सकता। कभी मिलतें थे जो सीरे,कल तक हर मोड़ पर आकर; इक सीरे ने कहा हैं,मिलने दूसरा सीरा नहीं जा सकता। अब तो जंग जैसे हो गए हैं,साहेब'मोहब्बत के हालात; किसने कहा है दिल की राह में,सिरफिरा नहीं जा सकता। गीले-शिक़वे ईश्क़ में'हैं बहुत छोटी बातें,इम्तेहान तब हैं; बगैर उसके रहा भी न जाए,मिला भी नहीं जा सकता।