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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अभिमन्यु

 ये सच परिष्ठति विकट हैं, दुर्योधन सुधारा नहीं जाएगा। हर बार युद्धभूमि में घेरकर,अभिमन्यु मारा नहीं जाएगा। उठों अर्जुन गांडीव उठाओ,आज का सूरज छिपने वाला हैं। तेरा मासूम वीर अभिमन्यु,पुरखों के छल से मिटने वाला हैं। दोनों वार तुम्हें ही हैं सहने,औरों से वारा नहीं जाएगा। हर बार युद्धभूमि में घेरकर,अभिमन्यु मारा नहीं जाएगा। हैं इतिहास गवाह मानवता से,न मानवता रक्षित हुआ हैं। अपने कुल का नाश किया हैं,जब कुलवंसक भक्षित हुआ हैं। सिद्धान्तों के वेदी से,अब हर झूठ नकारा नहीं जाएगा। हर बार युद्धभूमि में घेरकर,अभिमन्यु मारा नहीं जाएगा। हैं छल का दौर चल रहा यहाँ,तुझें भी छल करना पड़ेगा। अनुग्रही कर्ण से लरनें को,और भी' बाहुबल करना पड़ेगा। हो अग़र कृष्ण नहीं तो,फिर'दुर्योधन सँहारा नहीं जाएगा। हर बार युद्धभूमि में घेरकर,अभिमन्यु मारा नहीं जाएगा।

शर्म

माँ की नेकदिली,पिता का अहम बेच आए हैं। शहर गए थे जो गाँव के बच्चें,शरम बेच आए हैं। यूँ तो करनी तैयारी,घर की हकीक़त बदलने की; शिक्षा की आर में लेकिन,लिहाज़,धर्म बेच आए हैं। अब हर बात पर उनको,यहाँ समझाना पड़ता हैं; वो अदब,वो सलीका,सारी बातें नरम बेच आए हैं।

माँ

उम्र हमारी जब छोटी थी,काम ख्वाबों को बुनना था। एक तरफ थी बूढ़ी माँ,एक तरफ तुमको चुनना था। तुम्हीं बताओ क्या करते भला हम,ऐसे इन हालातों में; आसमान से अलग हुआ,तो'चाँद कैसे मिलता रातों में। तुम कानों के कुंडल थे,तो'उनसे कानों का सुनना था। एक तरफ थी बूढ़ी माँ,एक तरफ तुमको चुनना था। बात दिल में दबी रहें,तो'फिर रिश्तों में हैं मज़ा नहीं। माँ की शर्तों पे जाना जाँ,अब तुझको मेंरी रज़ा नहीं। क्या होता हैं खुलना पूछों,जो उनसे मेरा खुलना था। एक तरफ थी बूढ़ी माँ,एक तरफ तुमको चुनना था। किसी को थी उम्मीद हमारी,कहीं ख्यालों के मंज़र थे; माँ ने उगाए है पेड़ वहाँ,जो सालों तक कभी बंज़र थे। आँखें मिलनें से बेहतर,माँ के आँचल का मिलना था। एक तरफ थी बूढ़ी माँ, एक तरफ तुमको चुनना था।

सागर

 फूल शबनम के,छाँव नहीं आएगा। जा साग़र अब तेरे,गाँव नहीं आएगा। हालात मुश्किल हैं,सब्र अभी टूटा नहीं; मेरा ग़ुरूर कभी,तेरे पावँ नहीं आएगा। रश्क इतना क्यूँ है,तुझें मेरे मिलने से; क्या मोती लहरों के,बहाव नहीं आएगा। रोज खेलोगें तुम यहाँ,अगर दिल से;तो' तुम पथ्थर थोड़े हो,जो घाव नहीं आएगा।

रिश्वत

 एक अजब तिश्नगी हैं, रूह परेशान है साहेब। शहर मशगूल हैं,और यहाँ गावँ हैरान है साहेब। आदमी अब आदमी की,रहा भीड़ में ही नहीं हैं; सच किनारे खड़ा हैं, होकर बेजुबान हैं साहेब। यूँ तो दर्द बाँटने की,सरकार की स्कीमें बहुत हैं; कमीशन चाहिए,कहते वो सीना तान हैं साहेब। कौन खाता हैं,और कौन यहाँ नहीं खाता हैं; थाली बताती है,किसको कितना ईमान हैं साहेब। गरीब के बच्चें भी जब,कुर्सियों पर काबिज़ हुए हैं; रिश्वत माँगते हैं,सिस्टम का यही विधान हैं साहेब।

पानी

 तु मेरे साथ चल,तेरे लहरों को रवानी दूँगा। किसी दरीया ने कहा हैं,सागर को पानी दूँगा। भोले अगर फिर से, दिल मेरा छला गया,तो'  फिर न कभी तुझपर,मैं गंगा का पानी दूँगा। मेरी मर्दानगी का तुझें,सनम अंदाजा नहीं हैं; जिश्मानी हुआ भी,तो'नस्ल मैं खानदानी दूँगा। न दौलत हैं,न हम अभी मशहूर हुए है,मग़र' जो दे न सकें कोई,ईश्क़ में'वो मैं कुर्बानी दूँगा। ख़ुशबू से कब तलक,तु दिल को बहलाएगी; आज़माकर देख,मैं स्वाद तुझें जाफ़रानी दूँगा। खूबसूरती किसी की हो,उम्रभर कहाँ टिकती हैं; साथ निभाए,मैं तुझें वो' फ़िज़ा आसमानी दूँगा। कोई झूठा ख़्वाब मैं,दिखाने के काबिल नहीं हुँ; बस कतरा-कतरा कर,तुझें अपनी जवानी दूँगा।