रास्ते का पत्थर।


रास्तें का पथ्थर जानकर,हमको हटा दिया।
मुश्किलें पड़ी तो मुझको,अपना जता दिया।

      हम तो नादान थे,उनकी बातें समझे नहीं।
      जरूरतों के ख़ातिर,किए वादें समझें नहीं।
      समय के साथ,सबकुछ खोते गए।
      मंजिले भी दूर हमसे,यहाँ होते गए।
      हर किसी के दर्द में,रहे शामिल हम।
      फिर भी न रहे,किसी के काबिल हम।
      ताने वे भी देते है,जिनके थे हम मरहम।
      पता भी न चला,कब डगमगाए मेरे क़दम।
      कभी सोचता हुँ,भला मैंने क्या ख़ता किया।
रास्तें का पथ्थर जानकर,हमको हटा दिया।
मुश्किलें पड़ी तो मुझको,अपना जता दिया।।

      रिश्तें कि आर में,हम थम से गए।
      जब हुए न काबिल,तो सब से गए।
      समझाया सभी ने,की ये नादानी हैं।
      मैंने समझा,ये अपनो कि परेशानी हैं।
      बाँटने चले थे हम,उनकी तन्हाई।
      समय कि नज़ाकत,नज़र न आई।
      वही था समय,मेरी उत्थान का।
      मेरे भविष्य का,मेरी पहचान का।
      जंग चलता गया,भविष्य-वर्तमान का।
      क्या फ़र्ज बनता था, इक इंसान का।
      किसी ने मुझको न,सिर्फ इतना बता दिया।
रास्तें का पत्थर जानकर,हमको हटा दिया।
मुश्किलें पड़ी तो मुझको,अपना बता दिया।

      मैं दूर का नहीं, उनके पास का था।
      उनके दर्द का हमें भी,एहसास था।
      देख उनको,कैसे नजरअंदाज करता।
      किया था न अबतक,कैसे आज करता।
      कोई गैर नही,ये मेरा अपना खून था।
      मेरा बचपना था या' ये मेरा जुनून था।
      अच्छे-बुरे का न मुझे, पहचान था।
      उनका भी मुझपे'बहुत एहसान था।
      ज़रा सी भूल क्या हुई,मुझे गैरों में बता दिया।
रास्तें का पत्थर जानकर, हमको हटा दिया।
मुश्किलें पड़ी तो मुझको,अपना बता दिया।

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