ग़ुरूर
क्यूँ अपने हुस्न पे,इतना ग़ुरूर करती हो।
तु भी किसी से,मोहब्बत जरूर करती हो।।
क्यूँ छिपाती है,अपने चाहत के रंग हजार।
तेरी नजरों में देखा है,हमने किसी का प्यार।
कौन ख़ुशनसीब है वो'ज़रा मुझको ये तो बता।
किसी को चाहते रहना,ये भी कोई खता है क्या।
जो ख़ुद को भूलने को मुझे मजबूर करती हो।
क्यूँ अपने हुस्न पे,इतना ग़ुरूर करती हो।
तु भी किसी से,मोहब्बत ज़रूर करती हो।।
इक फिज़ा में होते है,सनम फ़साने अनेक।
सनम तेरी महफ़िल के,हम भी है दीवाने एक।
क्या बुरा किया जो तुझे चाहा है बेखबर।
क्यूँ मेरी नजरों से,तुझे लगने लगा है डर।
चाहतों के सफर में,आँखें अक्सर कसूर करती हैं।
क्यूँ अपने हुस्न पे,इतना ग़ुरूर करती हो।
तु भी किसी से,मोहब्बत ज़रूर करती हो।।
तु बाहर निकल,अपने हुश्ने-ग़ुरूर से।
पाला पड़ा है तेरा भी,किसी मग़रूर से।
ये तेरा फैशला है,जी चाहे जिसपर मरे;
मग़र शिकायत मुनासिब नहीं,यूँ दूर-दूर से।
हो इश्क़ ज्यादा तो'दिल को भी नासूर करती हैं।
क्यूँ अपने हुस्न पे,इतना ग़ुरूर करती हैं।
तु भी किसी से,मोहब्बत ज़रूर करती हैं।।
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