मेहनतकशीं

मैंने माना मैं नाला हुँ,सागर या नदी नहीं हुँ मैं।
मग़र ये कहना गलत है,मेहनतकशी नहीं हुँ मैं।

पहाड़ भी दोष मढ़ता है'तुने ही गिराया है मुझे,
उनको गिराया कैसे,जिनके बराबरी नहीं हुँ मैं।

बड़े लोगो कि बिरादरी में,जब'बैठा तो जाना,
उनकी नजर में गधे है हम,आदमी नहीं हुँ मैं।

हर बात पे एहसास कराते है अपनी ऊचाइयों,
आपकी उचाईयों से भला अजनबी नहीं हुँ मैं।

ताल्लुक़ दिल का उम्रभर,जिनसे निभातें रहें;
खंगाल कर देखा,उनके दिल में कहीं नहीं हुँ मैं।

बदस्तूर जारी हैं,हमपर यहाँ कयामतों का दौर;
यक़ीनन बेनूर हुँ भी,तो'दोस्त मतलबी नहीं हुँ मैं।

हमारी अच्छाइयों से,ख़ुदा हमें तंज़ीम देता हैं;
ख़ुदा को मानता हुँ, मग़र' मज़हबी नहीं हुँ मैं।

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