नासमझ


मैंने माना, हम तुमको समझ न सके !           
तुमने भी कहाँ हमको समझना चाहा !             
जब भी मिले,शिकायतों का दौर चला !         
खुद न बदले,सिर्फ हमें बदलना चाहा !!       
       बदल भी जाता,अगर मुझमे एक बुराई रहती !
       मगर तेरी बातो में भी, कुछ तो सच्चाई रहती !
       दिल भर जाता है तो,हर अच्छाई है बुरी लगती !
       सच का सामना हो तो,हर सच्चाई है बुरी लगती।
       मग़र किसने है यहाँ मिलकर,हैं बिछड़ना चाहां !
मैंने माना,हम तुमको समझ न सके।               
तुमने भी कहाँ हमको समझना चाहा !         
जब भी मिले,शिकायतों का दौर चला !         
ख़ुद न बदले,सिर्फ हमें बदलना चाहा !        
        अब तो सच के साए में,जीने की आदत डाल ली।
        तेरी यादो से निकले,तो पीने की आदत डाल ली !
        जख्म भड़ता नहीं,दर्द'फिर भी अब उभर आते हैं।
        तुझे भूलने की जिद में,मेरे जज्बात मुकर जाते है!
        दिल का क्या है,बस तेरे दिल में उतरना चाहा !
मैंने माना, हम तुमको समझ न सके।               
तुमने भी कहाँ हमको समझना चाहा ।           
जब भी मिले,शिकायतों का दौड़ चला             
ख़ुद न बदलें,सिर्फ हमें बदलना चाहा !         
        बात मुद्धत कि है,याद दिल में अभी बाकि है!
        तु आज दुश्मन ही सही,कल का मेरा साथी है!
        छोड़ शिकवे-गिले,क्या रखा है आजमाने में।
        शिकायत रह ही जाती है,रिश्ते को निभाने में।
        राह तकता है वही,जिसे तूने तोड़ा'कुचलना चाहा।
मैंने माना, हम तुमको समझ न सके।               
तुमने भी कहाँ हमको समझना चाहा।               
जब भी मिले,शिकायतों का दौड़ चला,             
ख़ुद न बदलें,सिर्फ हमें बदलना चाहा !         
        माना तेरी नजरो में'मै नासमझ ही सही,
        जो समझा था तूने रहा आज मै वो नहीं !   
        मगर बदलती है फिजा,कुदरत के लिए ही;
        भरोसा क्यू कर न सका,दो पल और सही !
        क्यूँ चंद बातो से, दिल से निकलना चाहा !
मैंने माना, हम तुमको समझ न सके ।             
तुमने भी कहाँ हमको समझना चाहा।             
जब भी मिले,शिकायतों का दौड़ चला,             
ख़ुद न बदलें,सिर्फ हमें बदलना चाहा।।

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