दुश्मनी

कल तक राहों में जो,मेरे फुल बिछाते थे,
आज मेरी ख़ातिर,उसने काँटो से दोस्ती कि हैं।

बाँटें थे अरमाँ हमनें,जिनसे अपने दिल के,
आज उन्होंने ही हमसे,दिल से दुश्मनी की हैं।

क्या पता उनको,भला इस दिल कि आरजू,
मेरे दिल ने किस कदर,उनसे दिल्लगी कि हैं।

हाँ ये सच है सनम,तड़पे होगे तुम भी बहुत,
मग़र मैंने घुट-घुट के,यहाँ सारी जिंदगी जी हैं।

तुझे औरों कि जरूरत,यहाँ नहीं हैं मेरे ख़ातिर;
मैंने तेरे ख़ातिर हर पल,सपनों कि बली दी हैं।

मेरा दर्द तुझको सनम,भलें महसूस हो न हो;
तेरे दर्द पे क़ुर्बा,मैंने अपनी सारी जिंदगी की हैं।

क्या मचले थे अरमाँ तेरे,मुझसे भी मिलने को,
मेरे अरमानों ने तो'तेरी यादों में,खुदकुशी की हैं।

तु भले भूल जाए,गुजरें वक़्त के उन पैमारों को;
मग़र मैं भूला दूँ कैसे,जिन लम्हों ने खुसी दी हैं।

हँसता हुँ मैं यहाँ,अब अपने रम-जो-गम पे भी,
तेरी वफ़ा ने ऐसी सनम,मेरी लबों पे हँसी दी हैं।

हैं तेरा फैसला क्या,जो भी हो'मेरे मित तु बता;
तेरी हसरतों के लिए,मैंने रब से बन्दगी की हैं।

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