जान
कभी मेरे भी घर में,यहाँ ख़ूब लगतें थे मेले;
वहां महफ़िल सजती थी,जहाँ श्मशान लगता है।
क्या रिश्ता था मेरा,जाकर उसी से पूछ लेना तुम,
मेरी वो जान लगती थी,जिसकी तु जान लगता हैं।
चला है बीच दोपहरी में,अपने महबूब से मिलने
दिलवर का टुटा छप्पर भी,आलिशान लगता है।
बिना दिल के देखे,कैसे दिलवर मान बैठी वो;
गजब है शादी का रिश्ता,खुदा बेईमान लगता है।
है ये कैसी मोहब्बत तेरी,भला अब तू ही जाने
जो हर पल हंसती रहती थी,परेशान लगता है।
था चेहरे पे फ़िदा,ज़रा दिल भी' देख लेता तु;
जो ज़िस्म में रहकर भी,उससे अंजान लगता हैं।
तू ठहरा अमीर पैसें का,दिल का मोल क्या जाने
हो सोने का पिंजरा भी,तो पंछी बेजान लगता है।
तू अबतक ख़ुशी का,दोस्त'मतलब नहीं समझा।
आदत हो घोसले की तो,महल वीरान लगता है।
मेरा चेहरा देख,तु खुद को खुबसूरत मान बैठा,
दिल भी देख लेता,जो उसका कद्रदान लगता है।
हमनें भी हवा संग,खूब खेली है अठखेलिया।
ईश्क पड़वान चढ़ता है,तो सब आसान लगता है।
हो बाहों में बाहें, तो हर रास्ता कट ही जाता है।
गाँव की संकरी हुई गलियाँ भी,जापान लगता है।
सीने में सिमटकर जिनके,मिलती थी तसल्ली
बातो से वही आज उनको,अब नादान लगता है।
कभी अच्छे * बुरे समय का,जो मेरा साथी था,
आज मिलना भी उसका,मुझें एहसान लगता हैं।
चौखट पे मेरे जिनके,कभी कटते थे रात-दिन,
देखकर मुझको वही,अब बहुत हैरान लगता है।
गुस्ताखी माफ़ करना,मुझसें दिल तेरा अगर दुखें;
जो तेरे लिए है रिश्ता,वो मेरा भगवान लगता है।
होता है हर्ष अक्सर,मोहब्बत का शादी के बाद;
पति परमेश्वर और प्रेमी,यहाँ गुलदान लगता है।
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