मुक़म्मल


चन्द बातों से मिट जाए,वो कोई दूरी तो नहीं।
हर आदमी मुकम्मल हो,ये ज़रूरी तो नहीं।।
       हर किसी को ख़ुश,रखना आसाँ नहीं।
       जिंदगी है ये कोई,तहज़ीब-ए-जहाँ नहीं।
       तु खास है,तो मैं भी यहाँ खास कम नहीं।
       बता जो तुझमें है,वो मुझमें है क्या नहीं।
       क्या हुआ चंद हसरतें,हुई अगर पूरी तो नहीं।
चन्द बातों से मिट जाए,वो कोई दूरी तो नहीं।
हर आदमी मुकम्मल हो,ये ज़रूरी तो नहीं।।
       हर बात पे चुभती, तुझे शहतर क्यूँ हैं।
       तेरा तरीका ही ज़िन्दगी में बेहतर क्यूँ हैं।
       हक जीने का अदा,तु करने दे हमें भी;
       खुद से लगता तुझे हर कोई,कमतर क्यूँ हैं।
       जीए तेरे हिसाब से सब,ये कोइ मजबूरी तो नहीं।
चन्द बातों से मिट जाए,वो कोई दूरी तो नहीं।
हर आदमी मुकम्मल हो,ये जरूरी तो नहीं।।
       शोहरतो की दौड़ हैं,पैसे कि मची होड़ हैं।
       हैं मुकम्मल वही,जो जितना बड़ा चोर हैं।
       न जाने ज़माने की नजरों को क्या हुआ है।
       जो है कुछ और,उन्हें दिखता कुछ और हैं।
       सुकूँ मिलता नहीं है,चंद कोशिशें अधूरी तो नहीं।
चन्द बातों से मिट जाए, वो कोइ दूरी तो नहीं।
हर आदमी मुकम्मल हो,ये ज़रूरी तो नहीं।।

       

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