जमाना

लिपटकर रह गए,इस कदर साख पत्तों में'
उनका जमीं को छुकर,फिर' जाना न रहा।

मेरी बेबसी का आलम यह हैं,बेअदब इश्क़'
तब हुआ जब,मोहब्बत का जमाना न रहा।

हमारी चाहतों से जो यहाँ,गुलजार रहता था;
वो मुंतजीर,वो मंजिल,वो आशियाना न रहा।

बहुत बातें होती थी,कभी सिर्फ़ निग़ाहों से;
महबूब मेरा पहले जैसा,यहाँ शयाना न रहा।

यूँ हुस्न की महफिल,सजती थी मेरे लिए भी'
तेरे चक्कर में'इस दिल का,ठिकाना ना रहा।

इस कदर सिमट गई,यहाँ मोबाइल में दुनिया;
के महबूब से मिलने का, कोई बहाना ना रहा।

उलझकर रह गए जज्बात,इस तरह दिल में,
तु अपना भी ना रहा,और बेगाना भी न रहा।

तुमसे पहले इतनी बुरी,नहीं थी मेरी दुनिया;
तुमसे होकर गुजरा तो'हँसी नजराना न रहा।

बहुत दर्द उभरा हैं,गीतों मे'तुमसे अलग होकर;
जो संग गाते थे गीत-गजल,वो तराना न रहा।

क्या करते'दिल की राह में,यूँ भला क़ुर्बान होते;
क़सक रही, मेरे मुताबिक़'मेरा दीवाना न रहा।

अक्सर तपता हैं वही यहाँ,जो सोना होता हैं,
अब दिल में उतरकर दिल को,आजमाना न रहा।
                                 
                                                   

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