बंटवारा


तुम थोड़ा बदल जाते,
तो वक्त आराम से कटता।
तकल्लुफ मुझे भी न होती,
भाई घर अपना न बटता।
     मैंने माना मैं बड़ा था,
     मुझे'भी बर्दाश्त करना था।
     मग़र पुरखों की इज्जत को,
     तुझे भी यादाश्त रखना था।
     सब्र के सायें में जीता, तो'
     कुँआसा गमों का भी छटता।
तकल्लुफ मुझे भी न होती,
भाई घर अपना न बटता।
     फिक्र माँ को तेरी थी उम्रभर,
      माँ को भी,तूने शर्मसार किया।
     पिता की बातें चुभती थी तुझें,
     औरों पे खुद को न्यौछार किया।
     हालात ऐसे हैं यहाँ तेरे ख़ातिर,
     अपनी आंगन में ये न घटता।
तकल्लुफ मुझे भी न होती,
भाई घर अपना न बटता।
      हर किसी के बात को यहाँ
      तुम भला कबूल कर लेते थे;
      गलतियाँ करते थे,और फिर'
      खुद को,बेउसूल कर लेते थे।
      साथ कुछ देर और चलते,तो'
      खाई रिस्तो का भी पटता।
तकल्लुफ मुझें भी न होती,
भाई घर अपना न बटता।

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