रिश्तें

अक्श आँखों में,यूँ ही छिपा लेते हैं।
चन्द रिश्ते हम,ऐसे भी बना लेते है।

तुम रहते हो,हमेशा दिल के ताबूतों में'
हम जिसे चाहें,आंखों में बसा लेते हैं।

हालात दिल के,माकूल हो न हो;मग़र'
हम कई रिश्ते,शब्दों से'निभा लेते हैं।

मेरी हर शाम यूँ,रंगीन होकर गुजरती हैं।
हम तो अपने,जख्मों का भी मज़ा लेते हैं।

अफ़सोस उनका क्या,जो हमारे ना हुए;
हम तो गैरों से भी,यहाँ रंग जमा लेते हैं।

जो दिल को अच्छा लगें,याद वही रखते हैं,
बाकी सब गिलें-शिकवे,हम भुला देते हैं।





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