वसीयत
दी ऊँची शिक्षा,अपने बच्चो को,
हर गम से मैं,निकाल आया था।
बस बचा कर,चंद गुजरी यादें;
मैं बीबी संग,नैनीताल आया था।
गिर पड़ा मंदिर की सीढियों से,
घर बुरी तरह निढाल आया था।
हजार रिस्ते निभाया,मग़र कोई;
देखने न,मुझें कमाल आया था।
जब गिन रहा था मैं आँखरी साँसे,
सुना' देखने मेरा लाल आया था।
चन्द साँसे थी,वो भी निकल गयी,
वक़्त यूँ मुझपर,पामाल आया था।
हाल बेटे ने,मेरा पूछा तक नहीं,कहा'
मुझें वसीयत का ख्याल आया था।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें