धीरे-धीरे


बदल रहती हैं यहाँ क्यूँ,ये फ़िजा धिरे-धीरे।
हो रहा क्या फिर,वो मुझसें बेवफ़ा धीरे-धीरे।

मेरे रब इन आंखों को,ज़रा तबस्सुम तो दे;
या तु भी'हो गया मुझसे,खफ़ा धीरे-धीरे।

यहाँ कौन समझेगा,भला जो जख़्म मेरा हैं।
उसकी ख्यालो में'हो गया है,हवा धीरे-धीरे।

बातें बहुत है मग़र,अब कहे से ना बनती है;
तेरी ज़िद से हुआ है,सब फासला धीरे-धीरे।

किसी की गुज़ारिश,तकल्लुफ को समझिए,
गुरुर किसी का हो'जाता है फ़ना धीरे-धीरे।

मेरे दोस्त तेरे हुस्न के,तलबगार बहुत हैं,मग़र'
रंगत ढ़लते हो जाएंगे,सब बेवफा धीरे-धीरे।

इक हमीं हैं जो हर हाल में तेरे है,तेरे ही रहेंगे;
हुए थे सूरत पे नहीं सीरत पे,फ़िदा धीरे-धीरे।

उसके आने से पहले,कहीं मैं मर ना जाऊ;
देता रह मुझको भी,यूँ कोई दवा धीरे-धीरे।।

इन्सां समझ के जिसको,सीने से लगाया था;
हो गया अब वो यहाँ,शायद ख़ुदा धीरे-धीरे।

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