बेटी
अगर समझते सभी रिस्तों कि मर्यादा,
होकर यहाँ लोग,कलंकित नहीं रहते।
अगर पिता कि बातें'तु मान लेती बेटी,
तो तेरे पिता आज,ससंकित नही रहते।
तु अभी देख,दुनिया को मेरी आँखों से,
कौन बुरा है,चेहरे पे' अंकित नही रहते।
अगर सभी के दिल में'खुदा बसता होता;
आज कई रिश्ते,होकर लंछित नही रहते।
लुटती है और भी चीज,पैसे के सिवा भी'
यौवन भी उम्रभर यहाँ,संचित नही रहते।
हर ज़ुर्म कि सज़ा'अगर मिल ही जाती तो,
इज्ज़त से खेलनेवाले, मंचित नही रहते।
उम्र के इस पड़ाव में,तु बेबाक़ न रहा कर;
मैं ठहरा बाप तेरा,कैसे चिंतित नही रहते।
बहुत कुछ पाना नहीं,बेटी तुझको गवांकर;
आबरू बची रहे बस,वो किंचित नही रहते।
तितलियों से भी यहाँ,लोगो को शिकायत हैं;
हैं मुश्किल ये कहना,कहाँ भक्षित नही रहते।
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