कोशिश
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुकाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।
हर घूँट के साथ,प्यास नई बढ़ती गयी।
पिया जो इक बार,कमबख्त साथ छोड़ती नहीं।
बिछड़े इस कदर राह से,छुट गयी सारी मंजिल।
अब समझ में आता है,काश संभाला होता दिल।
यूँ सोचते-सोचते हम,किसी काम तक न पहुँचे।
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुकाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
टुट गए दिल के अरमाँ,जो दिल में बाकी थे।
कल तक गलत थे जो,आज वही मेरे साथी थे।
पिते थे सभी पर,उनका कोई निशाँ न था।
पिते होंगे और भी,मेरे जैसा कोई पिया न था।
यूँ चाहकर भी हम,किसी अंजाम तक न पहुँचे।
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुकाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
नशा चढ़ गया जो इक बार,उम्रभर न उतरा।
सब सुधर गए पिनेवाले, मैं अब तक न सुधरा।
न पिना इसे ये जिंदगी,खराब कर जाती हैं।
सच बोलती है जुबाँ,हर दर्द का हिसाब कर जाती हैं।
जो पिते थे सुबह,वो घर कभी शाम तक न पहुँचे।
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुक़ाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
गुनाह है सच बोलना,दुनीया कि अदालत में।
छोड़ देंगे जब सभी,तुझे अपने ऐसी हालत में।
छुपा भी न पाएगा, दर्द तु सीने में।
तब तुम्हें ए दोस्त,मजा आएगा पिने में।
तेरे हाले-बयाँ का उनतक,पैगाम तो पहुँचे।
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुकाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
पर मुकाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
नशा चढ़ गया जो इक बार,उम्रभर न उतरा।
सब सुधर गए पिनेवाले, मैं अब तक न सुधरा।
न पिना इसे ये जिंदगी,खराब कर जाती हैं।
सच बोलती है जुबाँ,हर दर्द का हिसाब कर जाती हैं।
जो पिते थे सुबह,वो घर कभी शाम तक न पहुँचे।
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुक़ाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
गुनाह है सच बोलना,दुनीया कि अदालत में।
छोड़ देंगे जब सभी,तुझे अपने ऐसी हालत में।
छुपा भी न पाएगा, दर्द तु सीने में।
तब तुम्हें ए दोस्त,मजा आएगा पिने में।
तेरे हाले-बयाँ का उनतक,पैगाम तो पहुँचे।
कोशिशें किए हम बहुत,
पर मुकाम तक न पहुँचे।
सोचा था पियेंगे खूब मगर,
आँखरी ज़ाम तक न पहुँचे।।
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