शायर


मै लिखता हु,मगर हुँ शायर तो नहीं !
लाख उफने भी नदी, होती सागर तो नहीं !!
     बस दिल कि बात को, पन्नो पे उतारा हमने !
     अपनी जज्बातों को दिया,शब्दों का सहारा हमने !
     क्या करे कोई जब,दिल कि बात दिल से निकले !
     रोक सकता है कोई कैसे,हम बातो से फिसले !
     अपनी कहें से मुकर जाऊ,मै इतना कायर तो नहीं !
मै लिखता हु,मगर हुँ शायर तो नहीं!
लाख उफने भी नदी, होती सागर तो नहीं !!
     चंद शब्दों में सारे जज्बात निकाले कैसे !
     गम है बहुत सारे, ये दिल भी संभाले कैसे !
     क्या करे कोई कौन यहाँ,हाल-ए-दिल समझेगा !
     कोई मुझपे हँसेगा, तो कोई काहिल समझेगा !
     जो हाल दिल के अन्दर है वो बाहर तो नहीं !
मै लिखता हुँ, मगर हुँ शायर तो नहीं !
लाख उफने भी नदी, होती सागर तो नहीं !!
     लिखता हुँ हुस्न को,तो लोग ये कहते है !
     हम भी किसी के दिल में, जरुर रहते है !
     दिल का क्या है, ये तो एक आसरा चाहता है !
     मिले प्यार के बदले प्यार और क्या चाहता है !
     मैं इश्क से वाकिफ़ कम हुँ,फिरभी ये ज़हर तो नहीं!
मै लिखता हु,मगर हुँ शायर तो नहीं !
लाख उफने भी नदी, होती सागर तो नहीं !!
    हाँ ये सच है, मैं भी गम के साए में पला हूँ !  
    रौशनी पाने कि खातिर, मैं भी जला हुँ !
    मगर जब उजालो से, मैं घीर गया हुँ !
    मत पूछो यारो, कितना गीर गया हुँ !
    गिर के भी इतराऊ, इतना बेनजर तो नहीं !
मै लिखता हु, मगर हुँ शायर तो नहीं !
लाख उफने भी नदी, होती सागर तो नहीं !!

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