गुज़रा जमाना।


बड़ा याद आता है,अपना गुजरा जमाना।
छुट गया जो मंजर,वो टुटा आशियाना।।
      कहाँ गए वो लोग,कहाँ गयी वो बातें।
      शिकवा शिक़ायत,वो दिलकश मुलाकातें।
      अब तो हैं मिलते लोग,जुबाँ के सहारे।
      मिलता नही दिल,जैसे हो नदी के किनारे।
झगड़ें-गीले अपने,फिर'भूलकर मिल जाना।
बड़ा याद आता है,अपना गुजरा जमाना।
छूट गया जो मंजर,वो टुटा आशियाना।
      काश कभी फिर से,वो पल लौट जाते।
      गुजरे जमाने के,यहाँ कल लौट जाते।
      भूल जाता मैं भी,अपनी सारी हदों को,
       हजार मुश्किलें भूल,हम भी मुस्करातें।
न लौटेगा वो पल कभी,न लौटेगा फ़साना।
बड़ा याद आता है,अपना गुजरा जमाना।
छूट गया जो मंजर,वो टुटा आशियाना।।
      सोचता हुँ फिर से,हम बच्चें बन जाते।
      दुनीयादारी भूलकर, सच्चें बन जाते।
      अपनी ही धुन में, मगन रहते रात-दिन;
      बेफ़िक्र घुमतें, हुड़दंग खूब मचाते।
जिंदगी तो हैं,अपनें गुजरें पलों पर इतराना।
बड़ा याद आता है,अपना गुजरा जमाना।
छूट गया जो मंजर,वो टुटा आशियाना।।
      कहाँ गया वो,दिल से दिल का लगाना।
      इस छोटे दिल में,हजारों सपनें सजाना।
      अब तो प्यार हैं,झुठ-फ़रेब की बातें,
      थोड़ी दिल्लगी है,सब है  झूठे वादें।
हमने दुश्मनों से सीखा था,दोस्ती निभाना।
बड़ा याद आता है,अपना गुजरा जमाना।
छूट गया जो मंजर,वो टुटा आशियाना।।

      

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