दिल

टुकड़े में ही कर गए,वो हाल-ए-दिल बयाँ।
गम संभाले ऐसा कोई,दिल नहीं मिलता।।

हर तरफ इश्क़ का, बाज़ार सजा हैं, मग़र'
महबुब मोहब्बत के, काबिल नही मिलता।

फ़ितरते बदलती रहती हैं,आबों हवा के संग,
हो अदब के साथ हुस्न,शामिल नही मिलता।

अक्सर शिकायत है,उनको ही मोहब्बत से,
भड़ी उम्र में मोहब्बत,हासिल नही मिलता।

हजार ज़ुर्म होते है,रोज निगाहों निगाहों में ही,
मग़र इस इश्क़ में कोई,क़ातिल नही मिलता।

क़ुदरत ने शायद,अब बेहतर देना छोड़ दिया,
अब गालों पर'काला वाला तिल नही मिलता।

जमाना इश्क़ में शायद,बहुत तरक्क़ी कर गया;
नजरों को समझने वाला,ज़ाहिल नही मिलता।

इश्क़ जब करीए यहाँ,यक़ीनन डुब कर करीए;
लहरों के संग चलने सेे,तो'सााहिल नही मिलता।

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