भाई
चन्द यादों को आंखों में समेटें हुए,
कहीं किसी रोज,उसका पैगाम आ जाए।।
घर बनाना तो'इक कोना भाई का भी रखना,
क्या पता कब वो तेरे काम आ जाए।।
पिता कि दौलत की,वो भी इक निशानी हैं।
संग बचपन है बीता,संग बीती जवानी है।
माना तेरी दौलत पे,हक़ उसका नहीं है;
उसके खिलौनें पे की,तुमने भी मनमानी है।
घर की बातें तेरे कारण ही,न सरेआम आ जाए।
घर बनाना तो'इक कोना भाई का भी रखना,
क्या पता कब वो तेरे काम आ जाए।।
बड़ा हैं तो पगड़ी है,छोटा है तो शान हैं वो।
तेरी दरकती दीवारों का भी,निगेहबान हैं वो।
साथ रहेगा तो कंधे का बोझ कम कर देगा।
उसके बिना जमाना,तेरा ओज कम कर देगा।
कई उम्मीदों के सहारे,किसी शाम आ जाए।
घर बनाना तो इक कोना भाई का भी रखना,
क्या पता कब वो तेरे काम आ जाए।।
दुश्मन भी बड़ा है, दोस्त भी अलबेला है।
ज़िद्दी भी है मग़र, तुझे न छोड़ा अकेला है।
पिता की दौलत के लिए माना तुझसे लड़ेगा।
मग़र संभालेगा तुम्हें वही, जब भी तू गिरेगा।
बेटा पैसे पे अय्यासी करेगा,बीबी तेरे पैसे का भोग करेगी।
तन्हाई बाँटेगा भाई ही,बीबी चर्बी कम करने के योग करेगी।
वो इतने से ही इठलायेगा,तेरी लबों पे'उसका नाम आ जाए।
घर बनाना तो इक कोना भाई का भी रखना,
क्या पता कब वो, किस काम आ जाए।।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें