फ़ुरसत
लोग कहते है तुमसे न होगी मोहब्बत,
मैंने कहा-प्यार कि हमें फुर्सत कहाँ है!
अब दिल के बदले कोई,यहाँ जान लुटाए
लोगों में बची,अब इतनी हिम्मत कहाँ है!
सर कटने तक यहाँ,कोई नज़र तो मिलाए
किसी आँखों में एसी,अब जुरर्त कहाँ है!
जब से इश्क यहाँ, एक व्यापार बन गया;
दिलों में रहती किसी की,इज्जत कहाँ है!
मोहब्बत गलियों में,इस कदर बदनाम है;
इससे बड़ी दुनिया में,कोई तोहमत कहाँ है!
जिनके ख्यालों में हमने,कई उम्र गुजारी है,
आज मेरी यादो से,अब वही रुक्सत कहाँ है!
मै भी सनम तेरे इश्क में'यहाँ जान दे देता,
मगर पहले वाली अब वो,मोहब्बत कहाँ है!
मैंने लोगो को कोई बार,खंगाल कर हैं देखा;
सच्चे दिल कि लोगों को,अब जरुरत कहाँ है!
मेरे शब्दों से मुझें,यहाँ शायर न समझियेगा,
कवियों वाली मुझमें,रहती शराफ़त कहाँ हैं।
मोहब्बत की निशानी भी'कागजी हो गयी है,
इन कागजी फुलों में खुशबु,वो रंगत कहाँ है !
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