बेहिसाब

इस कदर न आप भी यहाँ,
खुद को यूँ,बेहिसाब रखिये।

निखर रही रोज तो'अपनें,
चेहरे पे जरूर,नक़ाब रखिये।

लाख हो अंजुमन फिर भी'
छिपा के आफताब रखिये।

रोज पाइए नई मंजिल भले,
जो छूट रहा है,हिसाब रखिये।

कौन कितना अपना है,जाने'
कोई ऐसी भी किताब रखिये।

भले कुछ न हो जिंदगी,मग़र'
हँसी चेहरे पे'लाज़वाब रखिये।

जिंदगी बेहिचक कट जाएगी,
अपनी आँखों में,ख़्वाब रखिए।

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