मंज़र

टूटता हूँ शीशे कि तरह,
सपने की तरह बिखर जाता हुँ ! 
देखता हूँ फिर वही मंजर, 
जब मै अपने घर को जाता हुँ !
    हर तरफ रहता है,अपने लोगो का ही घेरा
    फिर भी आँखों के सामने,रहता है अँधेरा
    इनमे कौन अपना है,पहचान नहीं पाता हुँ।       
टुटता हुँ शीशे कि तरह,
सपने की तरह बिखर जाता हुँ!
देखता हूँ फिर वही मंजर
जब मै अपने घर को जाता हुँ !
    जीवन के राहों में कितने है मुश्किलें
    बस ये उम्मीद है,कही तो होंगे फुल खिले
    इसी उम्मीद में जीता चला जाता हुँ !
टूटता हूँ शीशे कि तरह,
सपने की तरह बिखर जाता हुँ !
देखता हूँ फिर वही मंजर,
जब मै अपने घर को जाता हुँ !!
      किसी की फिक्र होती है, मेरी पढाई का
      कोई ताने देता है, मुझको मेरी लराई का
      क्या दिल में है मेरे,समझा भी नहीं पाता हुँ !
टूटता हूँ शीशे कि तरह,
सपने की तरह बिखर जाता हुँ !
देखता हूँ फिर वही मंजर,
जब मै अपने घर को जाता हुँ !!
      लोग अक्सर मेरे घावों को सहला जाते है
      अपनी बातो से मेरा दिल बदला जाते है
      वो समझते है दिल को तसल्ली मिलेगी
      उनकी बातो में मैं,और भी उलझ जाता हुँ !
टूटता हूँ शीशे कि तरह,
सपने की तरह बिखर जाता हूँ !
देखता हूँ फिर वही मंजर,
जब मै अपने घर को जाता हूँ
      मकसद नहीं जाने का फिर भी
      जीने की तमन्ना दिल में लिए है !
      मतलब नहीं पिने का फिर भी
      हर घुट को मजे से पिए है !
      वक्त एसे गुजरा है,मेरे दोस्त'
      भीड़ में भी तन्हा खुद को पाता हुँ !
टूटता हूँ शीशे कि तरह,
सपने की तरह बिखर जाता हूँ !
देखता हूँ फिर वही मंजर,
जब मै अपने घर को जाता हूँ
      आजमाने की अब ज़रूरत नहीं, 
      कितना दम मेरी बातो में है
      देख लेना तुम खुद गौर से, 
      चंद लम्हा मेरी सांसो में है !
      मालूम तुझे भी चल जाएगा, 
      अपना यहाँ कौन गैर है !
      जब मजमे है मेरे जीते जी, 
      मरने कि बस थोड़ी देर है !
      सब छोर देंगे मैयत मेरे हाल पे ,
      यह कहके कि कुछ पल में आता हुँ !
टूटता हूँ शीशे कि तरह,  
सपने की तरह बिखर जाता हूँ !
देखता हूँ फिर वही मंजर,
जब मै अपने घर को जाता हूँ।।

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