इंसाफ़


कल तक थे कठघरे में,आज इंसाफ करते हैं।
नफ़रत भरी जुबान में, चाहत कि बात करते हैं।।
       हैं सच क्या,झुठ क्या,यहाँ सब उनकी जुबानी हैं।
       हैं शोहरत का नशा उनपे'दौलत कि भी रवानी हैं।
       होता वही जो चाहते,किस्मत भी मेहरबान हैं।
       उनकी हर अदा के आज, कई क़द्रदान हैं।
       देखो किस कदर यहाँ पे' हालात बदलते हैं।
जो कल तक थे कठघरे में,आज इंसाफ करते हैं।
नफ़रत भरी जुबान में, चाहत कि बात करते हैं।।
       जब थे कठघरे में,खुद क़िस्मत के मोहताज थे।
       कभी सोचा भी नहीं था,जो होंगे वे आज थे।
       ये राज उनका कबसे,हम सीने में दबाये हैं।
       कैसे किस क़दर गीरकर,वो इतना उठ पाए हैं।
       आज उनको ही मिलती हैं सियासत,
       जो औरों के यहाँ जाकर,नाक रगड़ते हैं।
जो कल तक थे कठघरे में,आज इंसाफ करते हैं।
नफ़रत भरी जुबान में, चाहत कि बात करते हैं।
      अब कौन करेगा इंसाफ,जब हालात ही ऐसे हैं।
      मुज़रिम बन बैठा मुलाज़िम,होता न्याय कैसे हैं।
      करेगा वही इंसाफ,जो खुद के लिए मांगता था।
      किए ज़ुर्म इसी के लिए,आएगा ये दिन जानता था।
      तभी'जो हुआ उनके साथ,औरों के साथ करते हैं।
जो कल तक थे कठघरे में,आज इंसाफ करते हैं।
नफ़रत भरी जुबान में, चाहत कि बात करते हैं।
      बिकता हैं सबकुछ,पर स्वाभिमान बिकता नहीं।
      मेहनतकश नेकदिल,इंसान कभी बिकता नहीं।
      क्या हुआ हमको वो' ऊँचाई मिली नहीं;
      उनका क्या'जो पाने के लिए,कुछ भी कर सकते हैं।
जो कल तक थे कठघरे में,आज इंसाफ करते हैं।
नफ़रत भरी जुबान में, कुछ भी कर गुजरते हैं।।

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