ग़मे-जिंदगी
ए ग़मे-जिंदगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दिखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।
ओठों से निकलें शब्द,उनके दिल के जज़्बात न थे।
भूला दूँ अपना सकूँ,इतने उलझे मेरे जज़्बात न थे।
हाल-ए-दिल बयाँ करूँ,कहने से कुछ हासील न था।
मेरा दर्द वो समझ सकें, वो'इसके भी काबिल न था।
था मेरे गम से अंजान,मैं उसके दर्द से महरूम न था।
ए ग़मे-ज़िन्दगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
मेरा दर्द वो समझ सकें, वो'इसके भी काबिल न था।
था मेरे गम से अंजान,मैं उसके दर्द से महरूम न था।
ए ग़मे-ज़िन्दगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
उनकी अश्कों का बहना भी,एक कहानी थी।
झूठी मोहब्बत कि, इक झूठी निशानी थी।
उनके धोखे को भी प्यार समझते चले गए;
सोचा कच्ची उम्र में की, कोई नादानी थी।
सीखा था बहुत,मग़र मुझे धोखे का तालीम न था।
ए ग़मे-जिन्दगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
सोचा कच्ची उम्र में की, कोई नादानी थी।
सीखा था बहुत,मग़र मुझे धोखे का तालीम न था।
ए ग़मे-जिन्दगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
उनके लबों के हँसी का'मतलब कुछ और था।
शायद शुरू हुआ,तभी से मेरा बुरा दौर था।
हम मर-मिटे थे,उनके चेहरे की बानगी पर;
हमने समझा और,वो निकला कुछ और था।
आज उनका मोहताज हुँ,मैं इतना मजरूम न था।
ए ग़मे-जिंदगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
ए ग़मे-जिंदगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
अपने हुस्न को'मोहब्बत कि,जागीर समझती थी।
दिल से खेलना,वो अपनी तहजीब समझती थी।
किसी के भरोसे पे उतड़ना,यहाँ उसे आता न था;
चलते-फ़िरते लोगो को भी,वो तस्वीर समझती थी।
दूँ उसके किए कि सज़ा,मैं इतना ज़ालिम न था।
ए ग़मे-जिंदगी क्या तुझको,इतना मालूम न था।
दीखने में था वो जितना हँसी,दिल से मासूम न था।।
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