चिराग़


आग से आग,कभी बुझती नहीं।                   
जले जो शम्मे से चिराग,वो चिराग़ यूँ बुझती नहीं।
मिलता है दरिया समुन्द्र के राहो में।               
दरिया कि राहो में,समुन्दर कभी रुकती नहीं।     
      लाख जमा कर लो बूंद, वो समुन्द्र नहीं बनता।
      सिर्फ किताबो से ही,कोई सिकंदर नहीं बनता।
जब तक हौसला जुनू बनके,सिने से गुजरती नहीं।
जले जो शम्मे से चिराग,वो चिराग यूँ बुझती नहीं।
       मिट्टी के पुतले है बहुत,मर्दों का दिल मिलता नहीं।
       सिर्फ बहार आने से,गुलर का फुल खिलता नहीं।
मिले जो मर्दे दिल,सारी दुनिया झुकती नही।
जले जो शम्मे से चिराग,वो चिराग यूँ बुझती नहीं।
       पथ्थरों से उनको शिकायत,जिनके कोमल पाँव है।
       मंजिल मिली है उसे,जिसने जिंदगी लगा दी दाँव है।
वो जिन्दगी भी क्या,ख्वाब जिन आँखों में पलती नहीं।
जले जो शम्मे से चिराग, वो चिराग यूँ बुझती नहीं।
       वक्त बदलता नहीं,जो वक्त कि आगोश में है।
       तु अगर बेहोश है तो बता कौन यहाँ होश में है।
कर कोई एसा नशा,चढ़कर जो उतरती नहीं।
जले जो शम्मे से चिराग,वो चिराग यूँ बुझती नहीं।
       हो हौसला एसा कि, पत्थर में सुराग कर दें।
       तेरे जोशे-ए-जुनू से गुजरे,तो तु उसमे आग भर दें।
बदलेगा वक्त तभी,किस्मत ऐसे ही सँवरती नहीं।
जले जो शम्मे से चिराग, वो चिराग यूँ बुझती नहीं।
       कट रहा हर एक लम्हा, जिन्दगी का पल है।
       न आज को बरबाद कर,इसमे छिपा तेरा कल है।
थाम लेता वक्त को,तो बात यूँ बिगरती नहीं।
जले जो शम्मे से चिराग, वो चिराग यूँ बुझती नहीं।
       किस्मत का भरोसा छोर दे,ये अपना काम करती हैं।
       ऊँचे हौसला को तो,मंजिले भी सलाम करती हैं।
तु जिसके लिए तड़पा बहुत,वो भी तेरे लिए तरसती रही।
जले जो शम्मे से चिराग,वो चिराग यूँ बुझती नहीं।।

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