दिवाली
बड़ी मुश्किल से कट रहे हैं,ये कंगाली के दिन।
न जाने कैसे कटेंगे अबकी,अपने दिवाली के दिन।
क्या फिर पटाखे बन,मेरे अरमान ही फुटेंगे।
औरों के जलते दीप,घर की रौनकता लूटेंगे।।
बच्चे मिठाई का क्या,सिर्फ इंतजार ही करेंगे।
बीबी की बेरुखी से कैसे,हम दो-चार करेंगे
अब अफ़सोस होता है,जब बिताते थे खाली के दिन।
न जाने कैसे कटेंगे अबकी,अपने दिवाली के दिन।।
न वक्त को समझा,न वक्त के साथ चले।
हर पल मेरे संग,ख्वाबो की बारात चले।।
मजा लेते थे जिंदगी का, खूब आराम करते थे।
अपनी जवानी की नूमाइश, सरेआम करते थे।
हमने भी गुजारे है,तारीफ़ो में बजते ताली के दिन।
न जाने कैसे कटेंगे अबकी,अपने दिवाली के दिन।
ख्वाइशें पूरी होती,बिन जुबाँ से आवाज निकले।
मगर जब अपनी गली से,दोस्त हम आज निकले।
वही नजर हमसे न जाने,कितने सवाल करती है।
सब किस्मत है,ये किस्मत बड़े कमाल करती है।
कल के शहंशाह, आज बिताते है मवाली के दिन।
न जाने कैसे कटेंगे अबकी,अपने दिवाली के दिन
गुजरते हुए वक्त को,ए दोस्त' संभाल न सका।
जो याद थी दिल में, उसे भी निकाल न सका।
क्या सिला दूँ मै, उनके हौसला अफजाई का।
जब खुद की खूबियों को भी, खंगाल न सका।
याद आते है आज हमें, वो गुजरे ससुराली के दिन।
न जाने कैसे कटेंगे अबकी अपने दिवाली के दिन।।
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