इम्तेहान


इस कदर मोहब्बत में,मेरा इम्तेहान तुम न लो।
यूँ कतरा-कतरा करके, मेरी जान तुम न लो।
       मर जाएंगे ऐसे ही, हम तो हालात के मारे है।
       जिन्दा भी हैं तो क्या हैं, हम अब भी तुम्हारे है।
       वक्त बदल गया है लेकिन, हर बात नहीं है बदले।
       तेरे खातिर मेरे दिल के, जज्बात नहीं है बदले।
       तुम जो चाहे वो कह लो, मगर मुझे जान तुम लो।
इस कदर मोहब्बत में, मेरा इम्तेहान तुम न लो।
यूँ कतरा-कतरा करके, मेरी जान तुम न लो।।
        आज भी धड़कने, तुझे पास बुलाती है।
        हर लम्हों में तेरा, एहसास दिलाती है।
        तुझे भूलने की कोशिश मै करू भी तो कैसे ;
        तुझे एक पल भूलना, मुझे इतना सताती है।
        नहीं हो सकती मेरी, दो पल अपना मान तुम लो।
इस कदर मोहब्बत में, मेरा इम्तेहान तुम न लो।
यूँ कतरा-कतरा करके, मेरी जान तुम न लो।।
        दोष हमारा था,किस्मत भी न मेरे साथ थी।
        तुमसे नज़र मिलाने की,कहाँ मेरी औकाद थी।
        हमारा मिलना सिर्फ क्या, एक इत्तेफाक था ;
        या तेरे दिल में भी मेरे लिए, कुछ और बात थी।
        बता दो सनम' खुदा के लिए, पहचान तुम लो।
इस कदर मोहब्बत में, मेरा इम्तेहान तुम न लो।
यूँ कतरा-कतरा करके, मेरी जान तुम न लो।।
        तेरी बातो से न जाने क्यूँ, नफरत कि बू आती है।
        ये मेरा भरोसा है मोहब्बत,एक दिन रंग लाती है।
        सब्र टूट जाता हैं, यूँ बातों में पिघलकर ;
        प्यार भावनाओं में फिर से उमंग लाती है।
        न समझे मेरे दिल को,ख़ुद से अंजान तुम न हो।
इस कदर मोहब्बत में मेरा इम्तेहान तुम न लो।
यूँ कतरा-कतरा करके, मेरी जान तुम न लो।।

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