मंजील
मंजिल की तमन्ना जाग गयी,
रुकने का कोई इरादा नहीं
बस कुछ पल और चल तु राही,
अब मंजिल दूर ज्यादा नहीं
कट जाएगा ये लम्हा भी,जैसे और लम्हे बीते है !
जो मुश्किलों में आगे बढे है, वे ही हर जंग जीते है!
मर जाना, मिट जाना पर,अब हार हमें स्वीकार नहीं
क्यों घबराता है राही,क्या मंजिल से तुझे प्यार नहीं
टूट जाए जो राहो में,वो होता वीरो का इरादा नहीं।
मंजिल की तमन्ना जाग गयी,
रुकने का कोई इरादा नहीं।
बस कुछ पल और चल राही,
अब मंजिल दूर ज्यादा नहीं।।
हर कीमत पे पाके रहेंगे,मंजिल हमने ये ठान लिया।
मुश्किल है पर असंभव नहीं,पाना मैंने ये मान लिया
दो पल और तु चल,हर कदम पे तेरी निशानी होगी।
अगर हार गया तू पहले तो,लानत तेरी जवानी होगी।
योध्दा वही जो चलता जाए,रुकने का हो माद्दा नहीं।
जीने की तमन्ना जाग गयी,
रुकने का कोई इरादा नहीं।
बस कुछ पल और चल राही,
अब मंजिल दूर ज्यादा नहीं।
ये मत सोच कौन यहाँ पर,कौन जीता कौन हारा है !
आज अगर तु लड़ता है,तो कल भी यहाँ तुम्हारा है।
इतिहास गवाह है वक्त के आगे पत्थर भी पिघला है।
मेहनत के दमपर इंसा,यहाँ चाँद के आगे निकला है।
क्यों दम भरता है राही,अभी गुजरा वक्त ज़्यादा नहीं।
मंजिल की तमन्ना जाग गयी,
रुकने का कोई इरादा नहीं।
बस कुछ पल और चल राही,
अब मंजिल दूर ज्यादा नहीं।।
करता जा तु, प्रयास निरंतर।
होगा आज, कल से बेहतर।
हो राह कठिन या दूर मंजिल
तु राही है, तुझे बस चलना है।
न ही रुकना है,न सम्भलना है।
मंजिल छुट जाये, चाहे रास्ता।
तुझको है अपने पुरुखो का वास्ता।
इक नइ राह बना,अपने कल से कर वादा यही।
मंजिल की तमन्ना जाग गयी,
रुकने का कोई इरादा नहीं।
बस कुछ पल और चल राही,
अब मंजिल दूर ज्यादा नहीं।।
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