आदत
मैं बुरा आदमी नहीं, मगर बुरी आदतों से मजबुर हुँ ।
तन्हाइयों में जीया हुँ,तभी तो' रोशनी से इतनी दूर हुँ।।
ज़रा समझना दोस्तों,मेरे दिल के जज्बातों को।
कैसे बदल सकता था, मैं उन हालातों को।
जिसकी कसक आज भी,दिल में मेरे बाकी हैं।
बुरा मयख़ाना होगा मगर,बुरा होता नहीं साकी हैं।
अंधेरे में जिया हुँ,तभी रोशनी से इतनी दूर हुँ।
अंधेरे में जिया हुँ,तभी रोशनी से इतनी दूर हुँ।
मैं बुरा आदमी नही,मगर बुरी आदतों से मजबुर हुँ।
तन्हाइयों में जीया हुँ, तभी तो'रोशनी से इतनी दूर हुँ।।
वक्त सम्भलता नहीं,खुशी हाथों से फिसल जाती हैं।
ऐसे भी दिन दोस्तों, ये जिंदगी दिखलाती हैं।
क्या करेगा कोई आदमी,ऐसे परीवेश में।
बुरी आदतें मिलती है,तभी दोस्तों के भेष में।
कहती है थाम लो दामन,मैं तेरा अपना ज़रूर हुँ।
मैं बुरा आदमी नही,मगर बुरी आदतों से मजबुर हुँ।
तन्हाइयों में जीया हुँ,तभी तो'रोशनी से इतनी दूर हुँ।।
जब भी आदमी,अपने बुरे दौर से गुजरता हैं।
तब ही जाकर,सारी बुरी आदतें पकड़ता हैं।
हर किसी को यहाँ, जीने का बहाना चाहिए।
हालात जैसे हो आदमी को,मुस्कराना चाहिए।
कैसे छोड़ दूँ इन आदतों से ही,हुआ मैं मशहूर हुँ।
मैं बुरा आदमी नही,मगर बुरी आदतों से मजबुर हुँ।
तन्हाइयों में जीया हुँ, तभी तो'रोशनी से इतनी दूर हुँ।।
जब जिंदगी यारों, बेरंग पर जाती हैं।
बुरी आदतें तभी तो,संग पर जाती हैं।
जब आदमी खुद को मजबुर पाता हैं।
ये आदतें जीने का,नया ढंग सिखलाती हैं।
न जाना मेरी आदतों पे,न समझना मैं मग़रूर हुँ।
मैं बुरा आदमी नही,मगर बुरी आदतों से मजबुर हुँ।
तन्हाइयों में जीया हुँ, तभी तो'रोशनी से इतनी दूर हुँ।।
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